भारत और जापान ने शुक्रवार को मानव संसाधन आदान-प्रदान पर एक व्यापक कार्ययोजना की घोषणा की। इसके तहत अगले पांच वर्षों में दोनों देशों के बीच 5 लाख लोगों का आदान-प्रदान होगा। इनमें से 50,000 कुशल और अर्ध-कुशल भारतीय कामगारों को जापान में काम करने का अवसर मिलेगा। विदेश मंत्रालय (MEA) ने इस समझौते की पुष्टि की।
यह समझौता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापानी प्रधानमंत्री शिगेरू इशिबा के बीच टोक्यो में हुई 15वीं भारत-जापान वार्षिक शिखर बैठक 2025 का प्रमुख परिणाम रहा।
जापान की श्रम कमी को दूर करने की दिशा
विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने बताया कि यह समझौता दोनों अर्थव्यवस्थाओं की “प्राकृतिक पूरकता” को दर्शाता है।
उन्होंने कहा, “जापान की अर्थव्यवस्था गतिशील है लेकिन कुछ क्षेत्रों में उसे श्रमिकों की कमी का सामना करना पड़ता है। वहीं भारत के पास कुशल और अर्ध-कुशल कर्मियों का विशाल भंडार है, जो इस आवश्यकता को पूरा कर सकता है।”
इसके साथ ही, यह योजना न केवल जापान के श्रम संकट को दूर करेगी बल्कि संयुक्त शोध, व्यावसायीकरण और मूल्य सृजन के नए अवसर भी पैदा करेगी।
सिर्फ नौकरियां नहीं, सांस्कृतिक रिश्ता भी
यह कार्ययोजना केवल श्रम तक सीमित नहीं है। इसमें सांस्कृतिक, शैक्षणिक और सामाजिक स्तर पर भी आदान-प्रदान शामिल है। भारत में जापानी भाषा शिक्षा को बढ़ावा देने पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। विदेश मंत्रालय ने इसे “भविष्य में निवेश” करार दिया, जो दोनों देशों के नागरिकों के बीच गहरी समझ विकसित करेगा।
नेताओं ने बताया ऐतिहासिक कदम
संयुक्त प्रेस वार्ता में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “मानव संसाधन आदान-प्रदान की कार्ययोजना के तहत आने वाले पाँच वर्षों में विभिन्न क्षेत्रों में पांच लाख लोगों का आदान-प्रदान किया जाएगा।” दोनों नेताओं ने इस बात पर जोर दिया कि लोगों के बीच सहयोग और संपर्क भारत-जापान की विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी का एक मजबूत स्तंभ बनेगा।
व्यापक सहयोग का हिस्सा
यह मानव संसाधन समझौता उन कई अहम समझौतों का हिस्सा है, जो टोक्यो में घोषित किए गए। इनमें अंतरिक्ष, रक्षा, महत्वपूर्ण खनिज, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और स्वच्छ ऊर्जा जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
मोदी की जापान यात्रा यह संदेश देती है कि आज की आर्थिक कूटनीति केवल पूंजी प्रवाह तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रतिभा और लोगों के प्रवाह पर भी केंद्रित है।