हाइपरसोनिक मिसाइलों की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि वे बेहद तेज गति के साथ उड़ान के दौरान दिशा भी बदल सकती हैं। इससे दुश्मन के रडार और मिसाइल रक्षा प्रणाली के लिए उन्हें ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सिर्फ तकनीकी सफलता नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भारत की रक्षा क्षमता का बड़ा प्रदर्शन भी है।

इससे भारत को रक्षा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नई पहचान मिलेगी और भविष्य में मित्र देशों के साथ रक्षा सहयोग तथा निर्यात की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस उपलब्धि पर डीआरडीओ, उद्योग जगत और अकादमिक संस्थानों को बधाई दी।

स्क्रैमजेट तकनीक बनाती है मिसाइल को घातक सामान्य

मिसाइलों और लड़ाकू विमानों के मुकाबले हाइपरसोनिक मिसाइलें कहीं ज्यादा तेज और घातक होती हैं। इनमें इस्तेमाल होने वाला स्क्रैमजेट इंजन हवा से ही आक्सीजन लेकर काम करता है, इसलिए इसे अलग से आक्सीजन ढोने की जरूरत नहीं पड़ती। इससे मिसाइल हल्की, तेज और लंबी दूरी तक मार करने में सक्षम बनती है।

लेकिन इतनी अधिक गति पर सबसे बड़ी चुनौती इंजन और मिसाइल के अत्यधिक गर्म हो जाने की होती है। डीआरडीओ ने जिस “एक्टिव कूलिंग” तकनीक का सफल परीक्षण किया है, वह इसी समस्या का समाधान मानी जा रही है।

यह तकनीक इंजन को बेहद ऊंचे तापमान में भी सुरक्षित रखती है और मिसाइल को लंबे समय तक तेज रफ्तार से उड़ने में मदद करती है।