J&K हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, सुरक्षा के लिए खतरा मानते हुए सोपोर निवासी शख्स की पीएसए हिरासत बरकरार

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत सोपोर निवासी अहसान-उल-हक की हिरासत को बरकरार रखते हुए उसकी ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज कर दी है। यह फैसला जस्टिस एमए चौधरी ने सुनाया। मामले में 16 अप्रैल 2026 को फैसला सुरक्षित रखा गया था।

अहसान-उल-हक, पुत्र नजीर अहमद कंदाय, निवासी नौपोरा कलां सोपोर, की ओर से उसकी पत्नी सबिया ने याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता की पैरवी एडवोकेट मोहम्मद वाजिद हसीब ने की, जबकि सरकार की ओर से डिप्टी एडवोकेट जनरल हकीम अमन अली पेश हुए।

याचिका में जिला मजिस्ट्रेट बारामुला द्वारा 16 मई 2024 को जारी पीएसए आदेश को चुनौती दी गई थी। यह आदेश जम्मू-कश्मीर पब्लिक सेफ्टी एक्ट, 1978 की धारा आठ के तहत जारी किया गया था, ताकि कंदाय को प्रदेश की सुरक्षा के लिए हानिकारक गतिविधियों से रोका जा सके।

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि हिरासत आदेश अस्पष्ट और अप्रमाणित आरोपों पर आधारित है। साथ ही, संबंधित दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए और उसे प्रभावी प्रतिनिधित्व का अवसर नहीं दिया गया।

जमानत मिलने के बाद भी राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में रहा शामिल

वहीं, जिला मजिस्ट्रेट ने अदालत को बताया कि यह हिरासत निवारक प्रकृति की है और पर्याप्त सामग्री के आधार पर की गई है। उनका कहना था कि सामान्य आपराधिक कानून याचिकाकर्ता की गतिविधियों पर अंकुश लगाने में विफल रहा है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि अहसान-उल-हक कंदाय के खिलाफ वर्ष 2021 में सोपोर थाने में एफआइआर दर्ज की गई थी, जिसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 506 और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम की धारा 13 शामिल थीं। जमानत मिलने के बाद भी उसके कथित तौर पर राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल रहने के आरोप सामने आए।

रिकॉर्ड के अनुसार आतंकियों का मददगार

रिकॉर्ड के अनुसार, कंदाय को हिजबुल मुजाहिदीन और द रेजिस्टेंस फ्रंट से जुड़े आतंकियों का ओवरग्राउंड वर्कर बताया गया। अदालत ने कहा कि हिरासत आदेश, आधार, डोजियर, एफआइआर की प्रतियां और अन्य सभी दस्तावेज कंदाय को उपलब्ध कराए गए थे और उसे उसकी समझ की भाषा में समझाया गया था।

अदालत ने कहा कि निवारक हिरासत दंडात्मक नहीं, बल्कि एहतियाती उपाय है, जिसका उद्देश्य सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे से बचाना है। जस्टिस चौधरी ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में न्यायिक समीक्षा केवल प्रक्रियात्मक वैधता तक सीमित होती है। अदालत ने याचिका को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *