बदहाली से भरोसे तक, ढाई दशक में सुपरस्पेशियलिटी हेल्थ हब बना बिहार

 प्रदेश की स्वास्थ्य सुविधाओं में वर्ष 2005 से 2026 के बीच जो सुधार हुआ है, वह किसी क्रांति से कम नहीं है। पहले प्रदेश में खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में इलाज सुविधा नहीं थी।

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में पूरे माह में औसतन 39 मरीज जाते थे, जो अब बढ़कर 11 हजार 600 से अधिक हो गई है। सामान्य रोगों के लिए भी लोग दिल्ली-मुंबई या दूसरे राज्य जाते थे।

आज प्रदेश में कैंसर, किडनी-लिवर प्रत्यारोपण हो रहे हैं। अब ग्रामीणों को विशिष्ट व अति विशिष्ट उपचार के लिए पटना या नजदीकी बड़े शहर नहीं जाना पड़े, इसलिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को छह बेड से बढ़ाकर 30 बेड के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के रूप में विकसित किया जा रहा है।

यहां विशिष्ट उपचार की सुविधा होगी तो जिला अस्पतालों में अतिविशिष्ट उपचार की व्यवस्था करने की तैयारी है। उद्देश्य एक है इलाज की गुणवत्ता में सुधार के लिए अत्यधिक भीड़ का प्रबंधन।

आज मल्टीसुपरस्पेशियलिटी अस्पताल आईजीआईएमएस व एम्स पटना की ओपीडी औसतन पांच हजार से अधिक होती है प्रतिदिन। वहीं, पीएमसीएच व एनएमसीएच जैसे पुराने मेडिकल कॉलेजों की ओपीडी 2500 से 3000 तक पहुंच गई है।

हड्डी, नेत्र व इंडोक्राइन अति विशिष्ट अस्पताल एलएनजेपी, राजेंद्र नगर व न्यू गार्डिनर रोड की औसतन ओपीडी 600 से अधिक हो चुकी है। इनमें बड़ी संख्या में दूसरे जिलों के मरीज होते हैं।

सामान्य व मध्यम श्रेणी के रोगों का नजदीकी अस्पतालों या घर बैठे उपचार हो सके, इसलिए टेलिमेडिसिन को बढ़ावा दिया जा रहा है। सबसे बड़ी बात स्वास्थ्य सेवाओं का डिजिटल हेल्थ सिस्टम तैयार किया जा रहा है।

गांवों तक विशेषज्ञ इलाज व भीड़ प्रबंधन लक्ष्य

स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने कहा कि अब सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर आमजन का विश्वास बढ़ा है। अस्पतालों में बढ़ती भीड़ को देखते हुए अस्पतालों की संख्या व पुराने अस्पतालों की क्षमता बढ़ाई जा रही है।

राज्य अब स्वास्थ्य क्षेत्र में नई पहचान बना रहा है। हर व्यक्ति तक गुणवत्तापूर्ण व सुलभ इलाज पहुंचाना हमारा लक्ष्य है। गत कुछ वर्षों में किए सुधारों का असर है कि शिशु मृत्यु दर, मातृ मृत्यु दर व टीकाकरण जैसे स्वास्थ्य सूचकांक लगातार बेहतर हो रहे हैं।

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