ढाई लाख लोगों की प्यास बुझाने वाली गौला पर सिस्टम की लापरवाही, नदी बनी कूड़ाघर

 गौला ने इस शहर को क्या नहीं दिया। ढाई लाख की आबादी को पीने के लिए पानी दिया। हल्द्वानी और आसपास के करीब आठ हजार काश्तकारों को फसल लहलहाने के लिए पानी दिया।

इसके अलावा मानसून में बहकर आने वाले उपखनिज ने खनन कारोबार खड़ा कर साढ़े सात हजार वाहनस्वामियों, चालकों से लेकर इससे जुड़े अन्य लोगों को रोजगार भी दिया लेकिन जीवनदायिनी कही जाने वाली इस नदी को बदले में मिला कचरा। सिस्टम की लापरवाही से गौला के अलग-अलग हिस्से कूड़ेदान बन चुके हैं। अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की गाड़ियां इन ढेर के आगे से अक्सर गुजरती है मगर नीचे उतर हालत सुधारने का जिम्मा कोई नहीं उठा रहा।

गौला नदी शहरी और ग्रामीण क्षेत्र को दो हिस्सों में बांटती है। एक तरफ हल्द्वानी का पुराना शहर तो दूसरी तरफ गौलापार। यह नदी लालकुआं, बिंदुखत्ता से शांतिपुरी तक पहुंचती है। हल्द्वानी के लोग करीब ढाई लाख शीशमहल स्थित फिल्टर प्लांट में शोधन के बाद इसी नदी का पानी पीते हैं। इसके अलावा गौलापार, लामाचौड़, रामपुर रोड, बरेली रोड से लेकर बिंदुखत्ता तक के हजारों काश्तकार इसी के पानी से खेतों को सींचते हैं। लेकिन कई जगहों पर गौला की स्थिति दयनीय हो चुकी है।

चोरगलिया रेलवे क्रासिंग के बाद नदी के मुहाने पर कचरे का ढेर नजर आया। राजपुरा में नदी क्षेत्र को मानो ट्रंचिंग ग्राउंड बना दिया है। इसके अलावा कई अन्य जगहों से हर दिन भारी मात्रा में कूड़ा नदी में पहुंच रहा है। चिंता की बात यह है कि इसमें सामान्य कचरे के साथ ही बायोमेडिकल वेस्ट के तौर पर सिरिंज, इस्तेमाल की गई पट्टी-रूई और दवा के रेफर व बोतलें भी नजर आई। चिंता की बात यह है कि गूल-नहरों के माध्यम से पालतू मवेशी और जंगली जानवर इसी पानी को पीते हैं।

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