इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आगरा की प्रतिष्ठित बलवंत एजुकेशनल सोसाइटी के प्रबंधन को लेकर लंबे समय से चल रहे पारिवारिक विवाद पर अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि ‘राजा’ जैसी उपाधियां अब कानूनी रूप से अस्तित्व में नहीं हैं और ऐसे जटिल प्रबंधन विवादों का निपटारा रिट याचिका के माध्यम से नहीं, बल्कि सक्षम सिविल न्यायालय में ही किया जाएगा।
अदालत ने एकल पीठ द्वारा दिया गया वह आदेश भी रद कर दिया है, जिसमें दो भाइयों के बीच उपाध्यक्ष पद का कार्यकाल आधा-आधा बांटने का निर्देश दिया गया था।
मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने यह फैसला अनिरुद्ध पाल सिंह और जितेंद्र पाल सिंह के बीच चल रहे वर्चस्व विवाद पर सुनवाई करते हुए दिया है।
दोनों भाई राजा बलवंत सिंह की विरासत और उनके द्वारा स्थापित ट्रस्ट/सोसाइटी में ‘उपाध्यक्ष’ पद पर अधिकार को लेकर आमने-सामने थे। पूर्व में एकल पीठ ने समझौते के तौर पर दोनों के लिए ढाई-ढाई साल का कार्यकाल देने का फार्मूला तय किया था।


