राजाओं-महाराजाओं से सजी ऐतिहासिक मेला परंपरा, कट‍िहार माघी पूर्णिमा मेला के इतिहास को सहेजने की जरूरत

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कभी क्षेत्र की विशिष्ट पहचान रहा काढ़ागोला गंगा घाट पर लगने वाला माघी पूर्णिमा मेला अब धीरे-धीरे गुमनामी के अंधेरे में खोता जा रहा है। राजे-महाराजाओं की उपस्थिति से अपनी भव्यता बिखेरने वाला यह ऐतिहासिक मेला साल-दर-साल सिमटता जा रहा है। पांच दशक पहले तक इस मेले में दूर-दराज के इलाकों से भारी संख्या में लोग पहुंचते थे। बनारस की साड़ियां और फिरोजाबाद की चूड़ियां मेले का मुख्य आकर्षण हुआ करती थीं।

यूपी, राजस्थान सहित कई राज्यों से आते थे दुकानदार

कुरसेला स्टेट के उत्तराधिकारी रघुवंश नारायण सिंह द्वारा आयोजित इस मेले की तैयारियां महीनों पहले शुरू हो जाती थीं। कोलकाता, राजस्थान, वाराणसी, इलाहाबाद, बनारस, कानपुर, झारखंड, पटना सहित अन्य बड़े शहरों से दुकानदार यहां दुकान लगाने आते थे।

आस्था से जुड़ा है माघी पूर्णिमा मेला

मेले में मसाले, फल, कपड़े, बर्तन और फर्नीचर की जमकर बिक्री होती थी। बनारसी साड़ी और फिरोजाबाद की चूड़ियां खरीदने आसपास के जिलों से हजारों लोग काढ़ागोला पहुंचते थे। श्रद्धालुओं और आगंतुकों के मनोरंजन के लिए थिएटर, सर्कस, जादू, यमपुरी नाच, तैराकी और कुश्ती जैसी गतिविधियों का भी आयोजन किया जाता था।

लाव-लश्कर के साथ पहुंचते थे कई रियासतों के उत्तराधिकारी

बताया जाता है कि दर्जनों एकड़ में फैलने वाले इस मेले में दरभंगा महाराज के नेतृत्व में बनमनखी के तत्कालीन राजा कृत्यानंद सिंह, पूर्णिया के राजा भोलाचंद्र सिंह, नवगछिया साहू परबत्ता के राजा पीरनी लाल सहित कई रियासतों के उत्तराधिकारी रथों पर अपनी महारानियों के साथ पहुंचते थे। वे यहां तंबू गाड़कर गंगा स्नान करते थे। दूर-दराज से श्रद्धालु टप्पर लगी बैलगाड़ियों, भैंसा गाड़ियों और पैदल चलकर मेले का आनंद लेने आते थे।

मेले में होती थी सालभर की खरीदारी

वयोवृद्ध विमल मालाकार और मिथिलेश सिंह बताते हैं कि इस मेले में कई लोग पूरे वर्ष की खाद्य सामग्री और मसालों की खरीदारी कर लेते थे। लोगों को इस मेले का सालभर बेसब्री से इंतजार रहता था। हालांकि आज भी मेला लगता है, लेकिन गंगा कटाव और प्रशासनिक उपेक्षा के कारण काढ़ागोला गंगा घाट पर लगने वाले इस मेले का दायरा लगातार सिमटता जा रहा है।

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