फिल्मी भोजपुरी गानों से बिल्कुल अलग है बिहार का ये देहाती गाना, गांव की यादों को बयां करता है ये मैथिली लोकगीत
पटना। बिहार की पहचान सिर्फ भोजपुरी फिल्मों और उनके लोकप्रिय गानों तक सीमित नहीं है। प्रदेश के अलग-अलग इलाकों में सदियों से लोकगीतों की समृद्ध परंपरा रही है, जिनमें गांव का जीवन, बचपन, रिश्ते, त्योहार और रोजमर्रा की यादें सहज रूप से दिखाई देती हैं। ऐसा ही एक ठेठ मैथिली लोकगीत “मैना के बच्चा चिल्होरिया रे” है, जो सुनने वालों को गांव में बिताए बचपन के दिनों की याद दिलाता है।
मैना के बच्चे से जामुन मांगता है बच्चा
इस लोकगीत की सबसे खास बात इसकी सरल और मासूम कहानी है। गीत में एक बच्चा मैना के बच्चे से बातचीत करते हुए उससे पेड़ से मीठे और पके जामुन गिराने के लिए कहता है। बच्चे की जामुन खाने की इच्छा और पक्षी से उसका मासूम संवाद गीत को बेहद सहज और ग्रामीण रंग देता है।
गीत के भाव में बच्चे की शरारत भी दिखाई देती है। वह मैना के बच्चे से कहता है कि अच्छे और मीठे जामुन ही गिराना। इस तरह गीत किसी बड़ी कहानी के बजाय बचपन की एक छोटी-सी घटना को लोकधुन और स्थानीय भाषा में जीवंत करता है।
स्कूल छोड़ बगीचे में पहुंचने की कहानी
लोकगीत में गर्मी की दोपहर और बगीचे का भी जिक्र आता है। बच्चा जामुन खाने के लिए स्कूल के काम-काज और पढ़ाई से बचकर बगीचे में पहुंच जाता है। यह प्रसंग उस ग्रामीण बचपन की तस्वीर सामने लाता है, जब गर्मियों की छुट्टियों और दोपहर के समय बच्चे आम-जामुन के बगीचों में दोस्तों के साथ घूमते और फल तोड़ते थे।
आज के डिजिटल दौर में बच्चों का बचपन काफी बदल गया है, लेकिन इस तरह के लोकगीत पुराने ग्रामीण जीवन की उन छोटी-छोटी खुशियों को याद दिलाते हैं, जिनमें पेड़, बगीचे, पक्षी और दोस्तों के साथ खेलना रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हुआ करता था।
ठेठ मैथिली शब्दों में गांव की खुशबू
इस गीत की खूबसूरती इसकी भाषा में भी है। इसमें मैथिली के स्थानीय और बोलचाल के शब्दों का इस्तेमाल मिलता है। “चिल्होरिया” जैसे शब्द गीत को उसकी क्षेत्रीय पहचान देते हैं। इसकी भाषा किसी औपचारिक साहित्यिक शैली के बजाय गांव की सहज बातचीत जैसी लगती है।
मैथिली लोकगीतों की परंपरा में ग्रामीण जीवन और सामाजिक रिश्तों से जुड़े अनेक गीत पीढ़ियों से मौखिक रूप से आगे बढ़ते रहे हैं। लोकगीतों की यही मौखिक परंपरा उन्हें किताबों से अलग एक जीवंत सांस्कृतिक विरासत बनाती है।
आज भी लोगों को अपने गांव की याद दिलाता है
“मैना के बच्चा चिल्होरिया रे” जैसे लोकगीत सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं। इनमें उस जीवन की झलक मिलती है, जिसे गांव में पले-बढ़े लोग अपने बचपन से जोड़ सकते हैं। जामुन के पेड़, गर्मी की दोपहर, बगीचे में जाना और पढ़ाई से बचने की बाल सुलभ कोशिश—ये सभी प्रसंग गीत को यादों से जोड़ देते हैं।
भोजपुरी और मैथिली सहित बिहार की विभिन्न लोकभाषाओं में ऐसे अनेक गीत मौजूद हैं, जिनमें स्थानीय समाज और जीवनशैली की झलक मिलती है। यही वजह है कि आधुनिक संगीत के दौर में भी पारंपरिक लोकगीत अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

