देश की राजधानी नई दिल्ली में 12-13 सितंबर के बीच 18वें BRICS शिखर सम्मेलन का आयोजन है। ब्रिक्स समिट में शामिल होने के लिए रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत आ गए हैं। वहीं चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग 12 सितंबर को भारत आने वाले हैं।
BRICS पर दो हिस्सों में बंटी कांग्रेस
शशि थरूर ने BRICS की अहमियत बताते हुए कहा, ‘सबसे पहले, हम ग्लोबल साउथ के लिए एक अहम मंच दे रहे हैं। आप जानते हैं, ग्लोबल साउथ में 100 से ज्यादा देश हैं, लेकिन यहां हमारे पास ग्लोबल साउथ के 11 मुख्य देश हैं जो मिलकर विचारों की विविधता और उन देशों की रेंज का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनकी अध्यक्षता हम इस खास मौके पर कर रहे हैं।’
थरूर ने BRICS देशों की ताकत बताते हुए आगे कहा, ‘यह ग्रुपिंग, यानी 11 BRICS देश, दुनिया की ज्यादातर आबादी और ग्लोबल GDP के 41 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं।’
समिट की मेजबानी को प्रतिष्ठा का मामला बताते हुए थरूर ने कहा, ‘इस इवेंट की ग्लोबल स्तर पर बहुत अहमियत है। यह कोई छोटी बात नहीं है। यह ऐसी चीज है जिसे बाकी दुनिया को बहुत गंभीरता से लेना चाहिए।’
थरूर ने आगे कहा, ‘दूसरी बात एक दर्जन राष्ट्राध्यक्षों और सरकारों के प्रमुखों का आना बड़ी बात है। न सिर्फ BRICS के सदस्य बल्कि कुछ ऑब्जर्वर भी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री स्तर पर आ रहे हैं, यह हमारे लिए बहुत प्रतिष्ठा की बात है। यह एक खास तरह की कूटनीतिक रूप से सबको साथ लाने की क्षमता को दिखाता है, जिसकी ग्लोबल मंच पर अपनी अहमियत है।’
चिदंबरम ने उठाए सवाल
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने समाचार एजेंसी एएनआइ से BRICS पर बात करते हुए कहा, ‘मुझे नहीं पता कि कितने राष्ट्रपति और कितने प्रधानमंत्री आ रहे हैं। मुझे नहीं लगता कि पिछले दो-तीन ब्रिक्स शिखर सम्मेलनों से कोई ठोस फायदा या ठोस नतीजा निकला है।’
चिदंबरम के बयान पर बीजेपी ने तीखा हमला करते हुए उन्हें नाराज फूफा (हमेशा नाराज रहने वाले रिश्तेदार) वाले लोगों में से एक बताया, जो भारत की तरक्की को पचा नहीं पाते।
BRICS समिट के दौरान चुनौतियां
थरूर ने BRICS समिट के दौरान सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में कहा, ‘अब, इसका मतलब यह नहीं है कि सिर्फ फायदे ही हैं, चुनौतियां भी हैं, खासकर विचारों में एकरूपता न मिल पाना। उदाहरण के लिए, ग्लोबल मुद्दों पर एक साझा घोषणा-पत्र पर सहमति बनाना।’
थरूर ने आगे कहा, ‘जब विदेश मंत्रियों की बैठक हुई, तो आम सहमति से बना संयुक्त घोषणा-पत्र जारी करने के बजाय भारत ने ‘चेयर का घोषणा-पत्र’ (अध्यक्ष का बयान) जारी किया। क्या ऐसा फिर होगा? कुछ लोग इसे शायद एक झटका या समूह में बुनियादी तालमेल की कमी का संकेत मान सकते हैं, या क्या हम मतभेदों को सुलझा पाएंगे? यह हमारे राजनयिकों के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।’

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

