एक तरफ गंगा, दूसरी तरफ बरंडी; कटिहार में बीच तटबंध पर भय के साये में गुरमेला के ग्रामीण
गंगा, कोसी और बरंडी नदी के जलस्तर में लगातार वृद्धि से तटवर्ती गांवों की स्थिति भयावह बनी हुई है। बाढ़ के पानी से घिरे परिवार तटबंधों पर खंभे-खूंटे गाड़कर और पालिथिन डालकर किसी तरह जिंदगी गुजारने को विवश हैं। इनमें गुरमेला पंचायत की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक बनी हुई है।
मंगलवार को जागरण की टीम गुरमेला गांव पहुंची तो तटबंध किनारे कई लोग पानी में डूबे अपने घरों को निहारते मिले। ग्रामीणों ने बताया कि पंचायत के वार्ड संख्या एक, दो, तीन, पांच, आठ, नौ और दस कमोबेश बाढ़ के पानी से पूरी तरह प्रभावित हैं।
नवनिर्मित पंचायत सरकार भवन और कुंज ग्राम विद्यालय भी चारों तरफ से पानी से घिरा हुआ था। वार्ड संख्या तीन में सामुदायिक किचन के लिए भोजन तैयार करा रहे प्रतिनियुक्त शिक्षक संदीप पासवान ने बताया कि सोमवार देर शाम से बाढ़ पीड़ितों को भोजन परोसा जा रहा।
ग्रामीणों से मिली जानकारी के अनुसार गुरमेला में आठ जगहों पर सामुदायिक किचन शुरू कराया गया है। किचन के आसपास बच्चों की टोली भी मंडराती नजर आई।
पुरुष तो कहीं भी कर लेंगे शौच, महिलाएं कहां जाएंगी
बाढ़ प्रभावित इलाके में वार्ड संख्या दस की कई महिलाएं अपनी समस्या बताने पहुंचीं। करीना देवी, किरण देवी, रानी देवी, अंजन देवी, नूतन देवी और फूलो देवी ने कहा कि करीब एक से डेढ़ किलोमीटर लंबे तटबंध के दोनों ओर पानी ही पानी है। पुरुष तो किसी तरह कहीं जाकर शौच कर लेते हैं, लेकिन महिलाओं के सामने बड़ी समस्या है।
घरों के शौचालय और चापाकल तक बाढ़ के पानी में डूब चुके हैं। ऐसे में महिलाओं को शौच के लिए काफी परेशानी उठानी पड़ रही है। वृद्ध आशा देवी ने अपने फूस के घर के आंगन में जमा पानी दिखाते हुए कहा कि करीब 20 वर्ष पूर्व कटाव से प्रभावित होकर उन्होंने तटबंध पर शरण ली थी। पहले खुले में शौच की मजबूरी थी, लेकिन अब चारों तरफ पानी ही पानी है। ऐसे में महिलाओं की परेशानी और बढ़ गई है।
सामुदायिक किचन शुरू, शौचालय व चापाकल का मिला आश्वासन
पंचायत के मुखिया राजकुमार यादव ने बताया कि ग्रामीणों की समस्या से प्रशासन को अवगत कराने के बाद सोमवार से सामुदायिक किचन शुरू कराया गया है। मंगलवार को अस्थायी शौचालय और चापाकल लगाने का आश्वासन भी मिला है।
रोशनी के अभाव में अंधेरे में शरणस्थली
मुखिया राजकुमार यादव, पंचायत समिति सदस्य मिथिलेश यादव, वार्ड सदस्य सुरेश महतो आदि ने बताया कि तटबंध किनारे बिजली के पोल तो लगे हैं, लेकिन विभाग की ओर से अब तक तार नहीं खींचा गया है।
रात होते ही पूरा तटबंध अंधेरे में डूब जाता है। ऐसे में बाढ़ के बीच सांप और जहरीले कीड़े-मकोड़ों का भय लोगों को सताता रहता है।
कुल मिलाकर प्रशासन ने दो वक्त के भोजन की व्यवस्था कर बाढ़ पीड़ितों के पेट की चिंता तो दूर कर दी है, लेकिन तटबंध पर शरण लिए परिवार अब भी शौचालय, पेयजल और रोशनी जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

