सिंगरौली। नगर पालिका निगम सिंगरौली से जुड़ा महापौर के कथित फर्जी लेटर पैड और फर्जी हस्ताक्षर का मामला एक बार फिर चर्चा में है। यह मामला उस समय सुर्खियों में आया था जब महापौर रानी अग्रवाल के नाम से कथित तौर पर फर्जी हस्ताक्षरयुक्त शिकायत पत्र वरिष्ठ अधिकारियों को भेजे जाने का आरोप सामने आया। मामला मीडिया की सुर्खियां बनने के बाद कोतवाली बैढ़न थाना में अज्ञात व्यक्ति के विरुद्ध एफआईआर दर्ज की गई थी और पुलिस ने जांच शुरू की थी। हालांकि, लंबे समय बाद भी इस मामले का सार्वजनिक रूप से कोई अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है, जिससे कई तरह के सवाल उठ रहे हैं।

सूत्रों के अनुसार, जांच के दौरान कुछ खोजी लोगों के हाथ एक ऐसी तस्वीर लगी, जिसने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया। तस्वीर में एक व्यक्ति कथित तौर पर एक पीसीओ/कोरियर सेंटर के अंदर मोबाइल फोन हाथ में लिए खड़ा दिखाई देता है। वहीं सामने रखी मेज पर पीले रंग के कुछ लिफाफे भी दिखाई दे रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि इन्हीं लिफाफों में महापौर के कथित फर्जी हस्ताक्षर वाले शिकायत पत्र भेजे गए थे। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और इसकी सत्यता जांच के अधीन है।

सूत्रों का यह भी कहना है कि संबंधित स्थान के सीसीटीवी कैमरे में दिनांक और समय स्पष्ट रूप से दर्ज होने की बात कही जाती रही है। हालांकि, पुलिस या किसी सक्षम प्राधिकारी ने सार्वजनिक रूप से इस संबंध में कोई आधिकारिक जानकारी जारी नहीं की है।

चर्चाओं का एक और पहलू कथित कोरियर भुगतान से जुड़ा है। सूत्रों का दावा है कि जिन शिकायत पत्रों को वरिष्ठ कार्यालय भेजा गया था, उन्हें एक निजी कोरियर सेवा के माध्यम से भेजा गया और उसका भुगतान फोन के जरिए किया गया था। यह भी कहा जा रहा है कि इस भुगतान से जुड़े कुछ दस्तावेज कथित रूप से कुछ जिम्मेदार अधिकारियों के पास मौजूद हैं। यदि यह दावा सही है तो जांच एजेंसियां संबंधित रिकॉर्ड के आधार पर पूरे घटनाक्रम की कड़ियां जोड़ सकती थी।
इसी बीच, पूरे घटनाक्रम में नगर निगम के एक अधिकारी गोस्वामी का नाम लगातार चर्चाओं में रहा है। विभिन्न स्तरों पर उन पर कई प्रकार के आरोप लगाए जाते रहे हैं। हालांकि, यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि इन आरोपों की न्यायिक या सक्षम प्राधिकारी द्वारा पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित अधिकारी की ओर से भी इन आरोपों पर सार्वजनिक रूप से क्या पक्ष रखा गया है, इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है।
सूत्रों का कहना है कि जिस समय कथित फर्जी लेटर पैड और फर्जी हस्ताक्षर वाला मामला सामने आया, उसी दौरान संबंधित तस्वीर भी सामने आई थी। इसी आधार पर कुछ लोग विभिन्न तरह के अनुमान लगा रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम को लेकर एक बड़ा सवाल लगातार उठ रहा है कि यदि इतने गंभीर आरोप और चर्चाएं लंबे समय से होती रही हैं, तो जांच की स्थिति क्या है? आखिर इतने समय बाद भी अंतिम निष्कर्ष तक क्यों नहीं पहुंचा जा सका?
सूत्रों के हवाले से यह भी दावा किया जाता रहा है कि एफआईआर दर्ज होने के बाद संबंधित अधिकारी ने तत्कालीन कई वरिष्ठ लोगों से संपर्क कर स्वयं को बचाने का प्रयास किया। यहां तक कि कुछ लोगों द्वारा यह भी कथित आरोप लगाया जाता है कि मामले को प्रभावित करने के लिए बड़ी धनराशि खर्च की गई थी। कथित चर्चा है कि उस समय तत्कालीन गुप्ता नामक मैडम को साहब द्वारा लगभग 15 लाख का चंदा भी दिया गया था।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या महापौर के कथित फर्जी लेटर पैड और फर्जी हस्ताक्षर का रहस्य कभी पूरी तरह उजागर होगा? क्या कथित पीसीओ, कोरियर और सीसीटीवी फुटेज की कड़ियां जांच एजेंसियों को किसी ठोस निष्कर्ष तक पहुंचाएंगी? या फिर यह मामला भी समय के साथ फाइलों में दफन होकर रह जाएगा? इन सभी सवालों के जवाब अब निष्पक्ष और पारदर्शी जांच पर निर्भर हैं।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

