गोस्वामी फाइल-2: समयपाल की नौकरी से उपयंत्री तक का सफर! नियमों को दरकिनार कर मिली पहली नियुक्ति? जांच कब?

9.9kViews
1427 Shares

सिंगरौली। नगर पालिका निगम सिंगरौली के विद्युत शाखा में पदस्थ उपयंत्री गोस्वामी की सेवा यात्रा को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। इससे पहले भी उनके कार्यकाल और पदोन्नति को लेकर कई शिकायतें सामने आती रही हैं, लेकिन अब उनकी शुरुआती नियुक्ति को लेकर ऐसे दस्तावेज सामने आये हैं, जिनके आधार पर उनकी अनुकंपा नियुक्ति से लेकर बाद में मिली पदोन्नति तक की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

सूत्रों के अनुसार गोस्वामी की अनुकंपा नियुक्ति वर्ष 2002 में समयपाल के पद पर उनके पिता के आकस्मिक निधन के बाद की गई थी। हालांकि, उस समय लागू म.प्र. नगरपालिक निगम (अधिकारियों तथा सेवकों की नियुक्ति तथा सेवा की शर्तें) नियम, 2000 की अनुसूची-2 के अनुसार समयपाल पद के लिए गणित विषय के साथ उच्चतर माध्यमिक परीक्षा उत्तीर्ण होना अनिवार्य था।

आरोप है कि गोस्वामी ने नियुक्ति के समय वर्ष 1996 में माध्यमिक शिक्षा मंडल, मध्यप्रदेश से जीव विज्ञान संकाय के साथ उत्तीर्ण हायर सेकेंडरी (10+2) का प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया था, जो समयपाल पद के लिए निर्धारित योग्यता के अनुरूप नहीं था। तो ऐसे में उनकी प्रारंभिक नियुक्ति की वैधता पर गंभीर प्रश्न खड़े हो रहें हैं।सूत्रों का कहना है कि नियमों के अनुरूप शैक्षणिक योग्यता न होने के बावजूद न केवल नियुक्ति हुई, बल्कि बाद में उन्हें पदोन्नति भी मिल गई। सवाल यह उठ रहा है कि क्या नियुक्ति के समय शैक्षणिक योग्यता का परीक्षण किया गया था? यदि किया गया था तो नियुक्ति कैसे हुई और यदि नहीं किया गया तो इसकी जिम्मेदारी किसकी थी?

मामला यहीं तक सीमित नहीं है। सूत्रों के हवाले से यह भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि सेवा अवधि के दौरान पदोन्नति प्राप्त करने के लिए आवश्यक दस्तावेजों में भी अनियमितताएं की गईं। सूत्रों का दावा है कि चरित्र प्रमाण-पत्र तक स्वयं लिखे जाने जैसी गंभीर अनियमितताएं हुईं। जिसकी अभी तक किसी सक्षम एजेंसी द्वारा आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। सबसे बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि गोस्वामी की नियुक्ति से लेकर वर्तमान तक उनके पूरे सेवा रिकॉर्ड की निष्पक्ष जांच आखिर क्यों नहीं कराई गई। यदि वर्षों से शिकायतें मिल रही थीं तो संबंधित अधिकारियों ने जांच कर स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं की? इससे निगम की कार्यप्रणाली और निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

जानकारों का मानना है कि यदि नियुक्ति नियमों के विरुद्ध हुई है तो उसके बाद हुई पदोन्नति और सेवा संबंधी अन्य लाभों की भी विधिक समीक्षा आवश्यक होगी। वहीं यदि सभी प्रक्रियाएं नियमानुसार हुई हैं तो निगम प्रशासन को सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, ताकि लंबे समय से चल रहे विवाद और अटकलों पर विराम लग सके।

अब निगाहें नगर पालिका निगम सिंगरौली, नगरीय प्रशासन विभाग और संबंधित जांच एजेंसियों पर टिकी हैं कि वे इन आरोपों की निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सामने लाते हैं या फिर यह मामला भी पूर्व की शिकायतों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *