21 जून की तारीख हर साल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक ऐसी चेतावनी के रूप में दर्ज है, जो 51 साल बाद भी बताती है कि जब सत्ता निरंकुश हो जाए तो लोकतांत्रिक अधिकार कितनी आसानी से छीने जा सकते हैं।
यही वह दिन है, जब 1975 में आधी रात के बाद पूरे देश पर ऐसा सन्नाटा छा गया था, जिसने लोकतंत्र की आत्मा को झकझोर दिया। अखबारों की स्याही पर पहरा था, विपक्षी जेलों में थे और नागरिक अधिकार सिर्फ कागजों तक सीमित हो गए थे।
25 जून 1975..आज 51 साल हो गए हैं, जब देश में लोकतंत्र की हत्या की गई थी। आइए आपातकाल के बारे में आपने सभी सवालों के जवाब यहां पढ़ें..
देश में कितनी बार लगा था आपातकाल?
- 26 अक्टूबर 1962: चीन के साथ जंग और बाहरी आक्रमण के चलते यह आपातकाल लगाया था, जोकि जनवरी 1968 तक प्रभावी रहा।
- 3 दिसंबर 1971: पाकिस्तान के साथ युद्ध और बाहरी आक्रमण के चलते लगा था। यह आपातकाल जारी था, तभी 1975 में आंतरिक आपातकाल भी लग गया था।
- 25 जून 1975: तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कहने पर अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की घोषणा की थी। यह सबसे विवादास्पद आपातकाल था।
51 साल पहले आज के दिन क्यों लगी थी इमरजेंसी?
25 जून, 1975 को लगी इमरजेंसी की कहानी साल 1971 से शुरू होती है। 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी उत्तर प्रदेश की रायबरेली सीट से लड़ी थीं। इंदिरा के खिलाफ राजनारायण चुनाव मैदान में थे। उस साल रायबरेली में राजनारायण के पक्ष में हवा थी, लेकिन जब चुनाव परिणाम आए तो राजनारायण हार गए।
राजनारायण ने चुनावी अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए इंदिरा गांधी की जीत को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने 12 जून 1975 को इंदिरा गांधी की जीत को अवैध घोषित कर दिया था। इसी के साथ उन्होंने इंदिरा को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत किसी भी निर्वाचित पद को संभालने से अयोग्य घोषित कर दिया था। यह पहली बार हुआ था, जब किसी मौजूदा प्रधानमंत्री की कुर्सी अदालत के फैसले से डगमगाई थी।
आधी रात के फैसले से सुबह तक बदल गया था देश
इसके बाद राजनीतिक संकट गहराता गया। 25 जून 1975 को तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सलाह पर संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की घोषणा कर दी। सुबह होते-होते देश की राजनीति का नक्शा बदल चुका था।
जेलों में विपक्ष, अखबारों पर पहरा
रातोंरात विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां शुरू हो गईं। अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मोरारजी देसाई, चौधरी देवीलाल, चंद्रशेखर, बाला साहेब देवरस समेत लाखों राजनीतिक कार्यकर्ताओं, विपक्षी नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को बिना मुकदमे जेल में डाल दिया गया।
मीडिया हाउस और प्रिंटिंग प्रेस की बिजली काट दी गई। पत्रकारों पर भी शिकंजा कसा गया। इंदिरा के खिलाफ आवाज उठाने वाले 250 पत्रकारों को भी अरेस्ट कर लिया गया था। अखबारों की खबरें सेंसर होने लगीं। कई समाचार पत्रों को हर खबर छापने से पहले सरकारी मंजूरी लेनी पड़ती थी।
मां के राज में संजय की चलती थी तानाशाही
आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी की भूमिका लगातार बढ़ती गई थी। आलोचकों का आरोप था कि बिना किसी संवैधानिक पद पर रहते हुए भी वे कई महत्वपूर्ण फैसलों को प्रभावित कर रहे थे। किस गिरफ्तार कर जेल में डालना है और किसे नहीं, कहां बुलडोजर चलना है, नसबंदी अभियान और कई विवादास्पद सरकारी कार्यक्रमों में संजय ही फैसले करते थे।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जेल में रहते हुए कई कविताएं लिखीं, जो बाद में कैदी कविराय के नाम से प्रसिद्ध हुईं। उनकी एक प्रसिद्ध कविता को इंदिरा गांधी के राज्य संजय की तानाशाही पर व्यंग माना गया था। जिसकी पंक्ति थी…


