चीन में ‘नो मैरिज, नो किड्स’ का बढ़ा ट्रेंड, घटती जन्मदर बनी शी चिनफिंग सरकार की सबसे बड़ी चुनौती

 अंतरराष्ट्रीय राजनीति में चीन की चुनौतियों की चर्चा अक्सर अमेरिका से आर्थिक प्रतिस्पर्धा, ताइवान को लेकर तनाव या वैश्विक शक्ति संतुलन के संदर्भ में होती है। लेकिन इन सबके बीच चीन एक ऐसे संकट से जूझ रहा है जो आने वाले दशकों में उसकी अर्थव्यवस्था, समाज और राजनीतिक स्थिरता पर गहरा असर डाल सकता है। यह संकट है तेजी से घटती शादियों और जन्मदर का।

चीन में पिछले लगभग एक दशक से ‘नो मैरिज, नो किड्स’ का ट्रेंड लगातार बढ़ रहा है। आंकड़े बताते हैं कि 2025 की पहली तिमाही में देश में होने वाली शादियों की संख्या पिछले दस सालों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई। इस दौरान 17 लाख से भी कम विवाह पंजीकृत हुए। 2017 की तुलना में विवाह पंजीकरण के आंकड़े लगभग आधे रह गए हैं।

सरकार लोगों को शादी और बच्चे पैदा करने के लिए कर रही है प्रेरित

घटती जन्मदर को लेकर चीन सरकार की चिंता इतनी बढ़ गई है कि वह विभिन्न स्तरों पर लोगों को शादी और बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। पिछले वर्ष चीन की एक कंपनी शांटियन केमिकल ग्रुप ने अपने 28 से 58 वर्ष की आयु के कर्मचारियों को नोटिस जारी कर कहा था कि यदि वे सितंबर 2025 तक शादी नहीं करेंगे तो उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाएगा। नोटिस में यह भी कहा गया था कि शादी और बच्चे पैदा न करना सरकार की नीति के खिलाफ माना जा सकता है।

सरकार की ओर से विवाह परामर्श, मैचमेकिंग और पारिवारिक जीवन को बढ़ावा देने के लिए विश्वविद्यालयों में विशेष पाठ्यक्रम तक शुरू किए गए हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे कंटेंट पर निगरानी रखी जा रही है जो विवाह विरोधी विचारों को बढ़ावा देते हैं या महिलाओं और पुरुषों के बीच टकराव पैदा करते हैं।

सब्सिडी, छुट्टियां और आर्थिक सहायता के बावजूद नहीं बदल रहे हालात

चीन सरकार ने लोगों को शादी और बच्चे पैदा करने के लिए कई प्रोत्साहन योजनाएं शुरू की हैं। अब नागरिक देश में कहीं भी अपनी शादी रजिस्टर करवा सकते हैं। तीन वर्ष तक के बच्चों की देखभाल के लिए हर साल 3600 युआन यानी लगभग 50 हजार रुपये से अधिक की सब्सिडी दी जा रही है।

शादी और बच्चे के जन्म के बाद मिलने वाली छुट्टियों की अवधि बढ़ा दी गई है। कई क्षेत्रों में विवाह करने वाले जोड़ों को आर्थिक सहायता दी जा रही है। बच्चों के जन्म और प्रसव से जुड़े चिकित्सा खर्चों में भी सरकार सहयोग कर रही है। यहां तक कि तलाक संबंधी नियमों में भी बदलाव किए गए हैं और गर्भनिरोधक उत्पादों पर कर बढ़ाया गया है ताकि अधिक लोग परिवार बढ़ाने के लिए प्रेरित हों।

इसके बावजूद बड़ी संख्या में युवा शादी करने या बच्चे पैदा करने के लिए तैयार नहीं हैं।

महिलाओं पर बढ़ती जिम्मेदारियां बनीं बड़ी वजह

विशेषज्ञों का मानना है कि घटती शादियों और जन्मदर के पीछे सबसे बड़ा कारण महिलाओं पर पड़ने वाला सामाजिक और पारिवारिक दबाव है। चीन का समाज आज भी काफी हद तक पारंपरिक सोच वाला है। शादी के बाद घर और बच्चों की जिम्मेदारी मुख्य रूप से महिलाओं के हिस्से आती है।

कामकाजी महिलाओं के सामने अक्सर करियर और परिवार में से किसी एक को चुनने की स्थिति पैदा हो जाती है। यदि वे दोनों जिम्मेदारियां निभाना चाहें तो उनके ऊपर कार्यभार दोगुना हो जाता है। यही कारण है कि आधुनिक, शिक्षित और आर्थिक रूप से स्वतंत्र महिलाएं विवाह और मातृत्व को लेकर पहले की तुलना में अधिक सोच-विचार कर रही हैं।

कई विशेषज्ञों का मानना है कि मातृत्व महिलाओं के करियर के लिए सबसे बड़ी बाधाओं में से एक बन जाता है। बच्चे के जन्म के बाद उनके प्रमोशन, रोजगार और पेशेवर विकास के अवसर सीमित हो जाते हैं।

वन चाइल्ड पॉलिसी का नुकसान

चीन की वर्तमान स्थिति की जड़ें 1980 में लागू की गई वन चाइल्ड पॉलिसी में भी देखी जाती हैं। बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए चीन ने उस समय यह नीति लागू की थी, जिसके तहत विवाहित दंपतियों को केवल एक बच्चा पैदा करने की अनुमति थी।

नियमों का उल्लंघन करने वालों पर जुर्माना लगाया जाता था और कई मामलों में सख्त कार्रवाई भी की जाती थी। इस नीति ने जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित तो किया, लेकिन इसके दीर्घकालिक दुष्परिणाम अब सामने आ रहे हैं।

देश की आबादी तेजी से बूढ़ी होने लगी, कार्यबल सिकुड़ने लगा और बुजुर्गों की संख्या बढ़ती गई। इसके साथ ही लिंगानुपात में असंतुलन भी बढ़ा। बेटों को प्राथमिकता देने की सामाजिक प्रवृत्ति के कारण महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में कम होती गई।

कम होती कार्यशील आबादी से बढ़ी आर्थिक चिंता

कम जन्मदर का सबसे बड़ा असर चीन की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। युवा आबादी कम होने से भविष्य में काम करने वाले लोगों की संख्या घट रही है। इसका असर उत्पादन, उद्योग, कर संग्रह और आर्थिक विकास पर पड़ सकता है।

एक्सपर्ट्स के अनुसार चीन में एक बच्चे को 18 वर्ष की आयु तक पालने-पोसने में लगभग 5.38 लाख युआन यानी करीब 76 लाख रुपये खर्च होते हैं। महंगे मकान, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं भी युवाओं को शादी और बच्चे पैदा करने से रोक रही हैं।

महिलाओं की बदलती सोच भी बड़ा कारण

वन चाइल्ड पॉलिसी के दौरान जिन परिवारों में बेटियां पैदा हुईं, उनमें से कई परिवारों ने अपनी बेटियों को बेहतर शिक्षा और आर्थिक अवसर उपलब्ध कराए। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में ऐसी महिलाएं सामने आईं जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनीं और जिन्होंने यह समझा कि शादी करना ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य नहीं है।

केवल चीन नहीं, पूरी दुनिया के सामने चुनौती

यह समस्या केवल चीन तक सीमित नहीं है। दुनिया के 195 देशों में से लगभग दो-तिहाई देशों में प्रजनन दर 2.1 के रिप्लेसमेंट स्तर से नीचे पहुंच चुकी है। भारत भी इस चुनौती का सामना कर रहा है। हालिया आंकड़ों के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर 1.9 तक पहुंच चुकी है।

एक्सपर्ट्स का मानना है कि केवल सब्सिडी देने या महिलाओं से अधिक बच्चे पैदा करने की अपील करने से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए सस्ती आवास व्यवस्था, बेहतर चाइल्ड केयर सुविधाएं, लैंगिक समानता, प्रजनन अधिकारों की सुरक्षा और परिवार की जिम्मेदारियों का समान बंटवारा सुनिश्चित करना होगा।

सामाजिक बदलाव के बिना मुश्किल है समाधान

विशेषज्ञों के अनुसार यदि परिवार और बच्चों की जिम्मेदारी का अधिकांश बोझ केवल महिलाओं पर डाला जाएगा तो स्वाभाविक रूप से वे विवाह और मातृत्व से दूरी बनाना चाहेंगी। करियर और परिवार में से किसी एक को चुनने की मजबूरी समाप्त करनी होगी।

साथ ही महिलाओं को केवल पत्नी और मां की भूमिका तक सीमित देखने वाली सामाजिक सोच में बदलाव लाना होगा। तभी चीन सहित दुनिया के अन्य देशों में गिरती जन्मदर और घटती शादियों की चुनौती का प्रभावी समाधान संभव हो सकेगा।

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