टाटा स्टील में हर वेतन समझौते के बाद घटता गया एमजीबी

टाटा स्टील के करीब 10,800 कर्मचारियों का नया वेतन समझौता पिछले 17 महीनों से लंबित है। 1 जनवरी 2025 से बकाया इस वेज रिवीजन को लेकर कर्मचारियों में जहां एक ओर उत्सुकता है, वहीं दूसरी ओर गहरी विडंबना और मायूसी भी देखी जा रही है।
कर्मचारियों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि हर नए वेतन समझौते के साथ उनका मिनिमम गारेंटेड बेनीफिट (MGB) लगातार घटता जा रहा है, जिससे उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।

एमजीबी का गिरता ग्राफ: एक नजर इतिहास पर

टाटा स्टील में वेतन समझौतों के इतिहास पर नजर डालें तो एमजीबी में लगातार गिरावट दर्ज की गई है, जिसे अब कंपनी प्रबंधन एक परंपरा मानकर चल रहा है:

  •     1997 से 2006 (10 वर्ष): एनजीसीएस (NGCS) के तहत कर्मचारियों को 20 प्रतिशत एमजीबी मिला था।
  •     2007 से 2012 (5 वर्ष): पूर्व यूनियन अध्यक्ष रघुनाथ पांडेय के कार्यकाल में यह बढ़कर 21 प्रतिशत हुआ।
  •     2012 से 2018 (6 वर्ष): पूर्व अध्यक्ष पीएन सिंह ने कर्मचारियों को 18.25 प्रतिशत एमजीबी दिलाया।
  •     2019 से 2024 (7 वर्ष): निवर्तमान अध्यक्ष आर. रवि प्रसाद के कार्यकाल में सबसे बड़ा झटका लगा और एमजीबी गिरकर महज 12.75 प्रतिशत रह गया। यानी सीधे 5.5% की गिरावट आई।
वर्तमान में प्रबंधन इसी तर्ज पर आगे बढ़ते हुए महज 7.75 प्रतिशत एमजीबी बढ़ोतरी का प्रस्ताव दे रहा है, जिसका कर्मचारियों के बीच अंदरूनी विरोध शुरू हो गया है।

डीए फ्रीज होने से ओल्ड ग्रेड कर्मचारियों को दोहरा नुकसान

पिछले वेतन समझौते में ओल्ड ग्रेड के कर्मचारियों के महंगाई भत्ते (DA) को अपर सीलिंग के तहत 83,365 रुपये पर फ्रीज कर दिया गया था। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि 31 दिसंबर 2024 तक जिन कर्मचारियों का बेसिक वेतन 1.25 लाख रुपये था, उन्हें हर महीने 18,319 रुपये का सीधा नुकसान उठाना पड़ा।
इस विसंगति के कारण पुराने ग्रेड वाले कर्मचारी तकनीकी रूप से एक वेतन समझौते पीछे चले गए हैं। यदि आगामी नया वेतन समझौता कम से कम 14.6 प्रतिशत एमजीबी के साथ नहीं होता है, तो इन पुराने कर्मचारियों के ग्रेड के नुकसान की भरपाई नामुमकिन हो जाएगी।

इतिहास में पहली बार: अलग-अलग होगा सैलरी फैक्टर

इस विसंगति का असर यह होगा कि टाटा स्टील के इतिहास में पहली बार ओल्ड सीरीज ग्रेड के कर्मचारियों का सैलरी फैक्टर एक समान न होकर अलग-अलग होगा। यह फैक्टर अधिकतम 1.62 से लेकर घटते क्रम में 1.30 तक जा सकता है।

हायर पेंशन स्कीम पर भी सीधा असर: जिन कर्मचारियों ने बेहतर भविष्य के लिए ‘हायर पेंशन स्कीम’ (Higher Pension Scheme) का विकल्प चुना है, उन्हें इस बेसिक वेतन के नुकसान का खामियाजा जीवनभर भुगतना पड़ेगा। बेसिक कम होने से उनकी अंतिम पेंशन राशि भी सीधे तौर पर प्रभावित होगी।

वर्कर्स यूनियन के वर्तमान अध्यक्ष संजीव चौधरी ने वर्ष 2019 के समझौते की इन्हीं विसंगतियों को मुद्दा बनाकर चुनाव जीता था। हालांकि, पिछले कार्यकाल में एनोमेली कमेटी (Anomoly Committee) के माध्यम से वे इन्हें दूर नहीं कर पाए थे।
अब जब वे दूसरी बार निर्विरोध निर्वाचित हुए हैं, तो कर्मचारियों को उनसे बहुत उम्मीदें हैं। कर्मचारी चाहते हैं कि यूनियन नेतृत्व पिछले ग्रेड से सबक लेते हुए प्रबंधन के सामने मजबूती से पक्ष रखे।
मांग उठ रही है कि पीएन सिंह के कार्यकाल की तरह न सिर्फ एक बेहतर ग्रेड और एमजीबी सुनिश्चित किया जाए, बल्कि फ्रीज हो चुके डीए को भी तत्काल खुलवाया जाए ताकि कर्मचारियों को उनका वाजिब हक मिल सके।

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