हरियाणा के विधानसभा चुनाव की तरह निकाय चुनाव में भी दक्षिण हरियाणा के शहरों में भाजपा ने अपने किले को मजबूत बनाए रखा। सोनीपत में राजीव जैन के नेतृत्व में एक बार फिर भाजपा की छोटी सरकार बनेगी।
22 वार्ड वाले निगम में पांच कांग्रेस उम्मीदवार ही जीत सके। हालांकि यहां पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा का प्रभाव माना जाना है। इसके बावजूद अन्य सभी वार्डों में भाजपा ने कब्जा जमा लिया।
रेवाड़ी नगर परिषद चुनाव में भाजपा उम्मीदवार विनीता पिप्पल चुनाव तो बंपर मतों से जीत गई, लेकिन सदन में उन्हें बहुमत साबित करने के लिए पांच निर्दलीय पार्षदों का सहारा लेना पड़ेगा। 32 वार्डों वाले सदन के लिए 12 भाजपा उम्मीदवार जीते हैं।
कांग्रेस का एक ही उम्मीदवार जीता
कांग्रेस का एक ही उम्मीदवार जीता, जबकि अन्य निर्दलीय जीते अधिकतर पार्षद भाजपा के ही कार्यकर्ता थे, जो टिकट नहीं मिलने पर निर्दलीय मैदान में कूदे थे। धारूहेड़ा नगरपालिका में भी भाजपा को सफलता मिली है।
तीनों जगह हुए चुनाव के साथ भाजपा तथा कांग्रेस के दिग्गज नेताओं की साख जुड़ी हुई थी। रेवाड़ी तथा धारूहेड़ा के उम्मीदवारों का चयन भाजपा ने केंद्रीय राज्य मंत्री राव इंद्रजीत सिंह के कहने पर ही किया था।
उन्होंने करीब 15 दिनों तक अपने पैतृक निवास रामपुरा हाउस में रहकर प्रचार किया और उम्मीदवारों की जीत को अपनी साख का सवाल बना लिया था। चुनावी मंच से उन्होंने कहा भी था कि यह चुनाव उनके लिए साख बन चुका है।
हालांकि चुनाव प्रचार में मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी तथा उनके कैबिनेट के मंत्री और विधायक भी आए, जिसके चलते भाजपा उम्मीदवार को 14 हजार से अधिक मतों से जीत मिली।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तथा पूर्व मंत्री कैप्टन अजय सिंह ने अपने पुत्र पूर्व विधायक चिरंजीव राव के साथ दोनों ही जगहों की चुनावी कमान संभाल रखी थी।
पार्टी ने रेवाड़ी से निहारिका तथा धारूहेड़ा से कुमारी राज को टिकट भी उनके कहने पर दिए थे। चुनाव प्रचार में सांसद दीपेंद्र हुड्डा सहित कांग्रेस के कई बड़े चेहरे आए, इसके बाद भी दोनों जगहों पर कांग्रेस को पराजय झेलनी पड़ी।
कांग्रेस को करना होगा आत्ममंथन
कांग्रेस को अपनी हार पर मंथन करना होगा। पहले चुनाव में संगठन नहीं था, अब सभी जिलाध्यक्ष बने एक साल हो चुका है, फिर भी धरातल पर कोई असर नजर नहीं आया है। प्रदेश अध्यक्ष राव नरेंद्र सिंह नारनौल से हैं।
वह अपने क्षेत्र में ही पहले चुनाव में संगठन की मजबूती नहीं दिखा सके। जनता के बीच कांग्रेस नेता सही मुद्दा लेकर नहीं जा पाए। स्थानीय मामलों से अधिक राष्ट्रीय मुद्दों पर जोर देना भी उन्हें मंहगा पड़ गया।


