आवारा कुत्तों के बढ़ते खतरे और कागजी दावे, जमीनी स्तर पर क्यों फेल हो रहा है सिस्टम?

देश की सर्वोच्च अदालत ने साफ किया है कि नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि है। अदालत ने स्थानीय निकायों को आवारा कुत्तों के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए कड़े कदम उठाने और प्रभावी नीति बनाने के निर्देश दिए हैं।

कोर्ट का मानना है कि पशु अधिकारों की आड़ में इंसानी जिंदगी को दांव पर नहीं लगाया जा सकता। इसके बावजूद, दिल्ली सहित एनसीआर के नगर निगम, विकास प्राधिकरण और स्थानीय प्रशासन सिर्फ कागजी खानापूरी ही कर रहे हैं। इसकी मूल वजह भी है, राज्य सरकारें इस विकट समस्या पर अभी तक भी बहुत गंभीर नहीं हुई हैं।

जब भी कोई बड़ी घटना होती है, तो कुछ दिनों के लिए हेल्पलाइन नंबर जारी कर दिए जाते हैं, लेकिन कुछ ही समय बाद स्थिति जस की तस हो जाती है। जमीनी स्तर पर क्यों फेल हो रहा है सिस्टम? सुप्रीम कोर्ट ने तो अपने पिछले दस माह पहले आदेश को ही कुछ तथ्यों पर बल देते हुए दोहराया है। लेकिन पिछले आदेश को भी लंबा समय बीत जाने के बाद भी न तो शेल्टर होम बने और न ही खतरनाक कुत्तों को सार्वजनिक स्थानों से हटाया गया।

एनसीआर के अन्य शहरों की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर दिल्ली समेत एनसीआर में खतरनाक कुत्तों के लिए शेल्टर होम बनाकर सार्वजनिक स्थानों से ऐसे कुत्तों को क्यों नहीं हटाया जा रहा।

इसके लिए कौन है जिम्मेदार? आवारा कुत्तों की समस्या विकराल होने के पीछे बार-बार सरकार और प्रशासन की ओर से बड़ी कमियां सामने आती हैं? अब सुप्रीम कोर्ट के नियमों का पूरी तरह से पालन कराने के लिए क्या ठोस उपाय हों इसी की पड़ताल हमारा आज का मुद्दा है :

आवारा कुत्तों का खतरा और मौन प्रशासन

पूर्व केंद्रीय मंत्री विजय गोयल ने कहा कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में आवारा कुत्तों के मुद्दे पर हुई सुनवाई ने एक बार फिर उस गंभीर समस्या को सामने ला दिया है, जिसे देश के करोड़ों लोग रोज महसूस करते हैं। 19 मई को सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व आदेश को बरकरार रखते हुए साफ कहा कि आवारा कुत्तों द्वारा बच्चों, बुजुर्गों और आम नागरिकों पर हो रहे हमलों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि स्कूलों, अस्पतालों, खेल परिसरों, बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों और अन्य सार्वजनिक स्थलों की उचित घेराबंदी की जाए ताकि आवारा कुत्तों की आवाजाही रोकी जा सके। साथ ही स्थानीय प्रशासन को यह जिम्मेदारी दी गई कि हटाए गए कुत्तों को निर्धारित शेल्टर होम में रखा जाए। कोर्ट ने यह भी कहा है कि अब खुले मैदानों और सड़कों पर आवारा कुत्तों को खाना नहीं खिलाया जा सकेगा। केवल नगर निगम द्वारा निर्धारित स्थानों पर ही भोजन कराया जा सकेगा।

यह विडंबना है कि आवारा कुत्तों से उत्पन्न भयावह स्थिति को अब भी बहुत लोग समझने को तैयार नहीं हैं और तथाकथित “पशु प्रेमी” तो बिल्कुल भी नहीं। वास्तव में ये पशु प्रेमी नहीं, केवल कुत्तों को खिलाने वाले लोग हैं। क्योंकि जब गाय, बकरा, मुर्गा या मछली कटते हैं, तब मैंने कभी इनकी आवाज नहीं सुनी।

इनके आंदोलन केवल कुत्तों तक सीमित हैं, इंसानों की पीड़ा तक नहीं। हम पिछले तीन वर्षों से “लोक अभियान” के माध्यम से आवारा कुत्तों के आतंक और काटने की घटनाओं के खिलाफ आंदोलन चला रहे हैं। उस समय हमसे कहा जाता था कि हम “माहौल” बना रहे हैं। आज वही माहौल देश की सर्वोच्च अदालत से निर्णय के रूप में सामने आया है। सरकारें भले जमीन पर कार्रवाई न करें, लेकिन अदालत में अब इस समस्या की गंभीरता स्वीकार कर रही हैं।

अगर कुत्ता काटने के आंकड़ों पर नजर डालें तो समझ में आएगा कि स्थिति कितनी भयावह है। विभिन्न सरकारी रिपोर्टों और अस्पतालों के आंकड़ों के अनुसार, 2024 में दिल्ली में लगभग 25 हजार से अधिक आधिकारिक मामले दर्ज हुए। अगस्त 2025 तक यह संख्या 26,334 तक पहुंच गई। सफदरजंग अस्पताल में 2021 में लगभग 63 हजार कुत्ता काटने के मरीज आए थे, जबकि जुलाई 2025 तक यह संख्या 91 हजार से अधिक हो गई।

कुछ रिपोर्टों के अनुसार राजधानी में प्रतिदिन लगभग 2,000 एनिमल बाइट के मामले सामने आते हैं, जिनमें अधिकांश कुत्तों के काटने से जुड़े होते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी 2025 में टिप्पणी की थी कि देशभर में कुत्ता काटने के मामले “अलार्मिंग” स्तर पर पहुंच चुके हैं और दिल्ली विशेष चिंता का विषय बन गई है।

इन बढ़ती घटनाओं को देखते हुए अदालत ने पहले भी राष्ट्रीय राजमार्गों, एक्सप्रेसवे और सार्वजनिक मार्गों से आवारा पशुओं को हटाने के निर्देश दिए थे। राज्य सरकारों ने अदालत को आश्वासन भी दिया कि वे इस दिशा में कार्रवाई करेंगी। दिल्ली सरकार ने भी माना कि आवारा कुत्तों का खतरा गंभीर रूप ले चुका है।

मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने घोषणा की थी कि सरकार जल्द ही एक समग्र नीति बनाएगी और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को योजनाबद्ध तरीके से लागू करेगी। दिल्ली के हर जोन में डॉग शेल्टर बनाने और विशेष समितियां गठित करने की बात कही गई। लेकिन सवाल यह है कि इन घोषणाओं का जमीन पर कितना असर दिखाई देता है?

वास्तविकता यह है कि योजनाएं अभी भी फाइलों में अधिक और सड़कों पर कम दिखाई देती हैं। एमसीडी ने डॉग शेल्टर, माइक्रोचिपिंग, नसबंदी केंद्रों की संख्या बढ़ाने और आक्रामक कुत्तों के लिए अलग सुविधा विकसित करने जैसे कई वादे किए, लेकिन अधिकांश योजनाएं शुरुआती चरण से आगे नहीं बढ़ पाई हैं।

डॉग शेल्टर और माइक्रोचिपिंग के लिए 40 करोड़ का प्रविधान

2026-27 के बजट में डॉग शेल्टर और माइक्रोचिपिंग के लिए लगभग 40 करोड़ रुपये का प्रविधान किया गया है, लेकिन यह तभी सार्थक होगा जब योजनाओं को तेजी और पारदर्शिता के साथ लागू किया जाए। समाधान कठिन नहीं हैं, यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक गंभीरता दिखाई जाए। रेबीज टीकाकरण अनिवार्य हो।

आक्रामक और बार-बार हमला करने वाले कुत्तों को सड़कों पर खुला छोड़ने के बजाय उचित शेल्टर में रखा जाए, जहां उनकी देखभाल भी हो सके। साथ ही शहरों में खुले कूड़े के ढेर खत्म करने होंगे, क्योंकि यही आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या का सबसे बड़ा कारण हैं।

कोर्ट के आदेश पर तत्काल एसओपी की जरूरत

पशु चिकित्सा सेवाएं और एमसीडी डॉ. वीके सिंह ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले अगस्त 2025 और फिर नंवबर 2025 और मई 2026 के आदेश देकर नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोपरि मानते हुए आवारा कुत्तों में खासकर खतरनाक कुत्तों को लेकर दिशा निर्देश दिए हैं। पूर्व में कोर्ट ने सार्वजनिक स्थानों से इन आवारा कुत्तों को हटाने का निर्देश दे दिया था, लेकिन मई 2026 के आदेश में एक नई चीज कोर्ट ने जोड़ी है वह खतरनाक और आदततन कटखने कुत्तों को लेकर हैं।

इसमें कोर्ट ने कहा कि इन आदतन जो कटखने कुत्तें हैं उन्हें अलग किया जाए। साथ ही उन्हें जिस प्रकार रेबीज के कुत्ते को दयामृत्यु का प्रविधान है ऐसे ही असाध्य रूप से बीमार कुत्ते और अत्याधिक अक्रामक और जोन मानव जीवन के लिए खतरा बने उन्हें भी दया मृत्यु दी जा सकेगी।

अब यह सवाल आएगा कि आखिर असाध्य रूप से बीमार और अत्याधिक अक्रामक कुत्तों की पहचान कैसे होगी। साथ ही कैसे निर्णय होगा कि कौन सा कुत्ता उपरोक्त श्रेणी में आता है या नहीं आता है। इसलिए ऐसे कुत्तों की पहचान और निर्णय के लिए सबसे पहले या तो केंद्र सरकार अपने स्तर पर इसकी मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) बनाए या फिर स्थानीय निकाय अपने-अपने स्तर पर एक समान एसओपी बनाए।

अगर, एनसीआर में सभी निकाय एक साथ बैठकर एक समान एसओपी बनाते हैं तो इससे भ्रम की स्थिति भी नहीं रहेगी। साथ ही एक जैसा कानून होने से कार्रवाई और सुगम हो सकेगी। इसलिए आदतन कटखने कुत्तों को या फिर अक्रामक कुत्तों की पहचान के लिए सबसे पहले समयबद्ध तरीके से एसओपी बननी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश अपने अगस्त और नवंबर के आदेश में स्पष्ट किया है कि जो सार्वजनिक स्थान हैं जैसे मेट्रो स्टेशन, बस अड्डा, स्टेडियम, स्कूल, अस्पताल, रेलवे स्टेशन, सरकारी इमारतों से ऐसे कुत्तों को हटाकर शेल्टर होम में डालें। ऐसे में इन कुत्तों को इन स्थानों से तब ही हटाया जा सकता है जब हमारे पास शेल्टर होम हो।

शेल्टर होम को कितनी तत्परता से बनाएं फिर भी छह से आठ माह का समय लग जाएगा। स्थायी और माडर्न शेल्टर होम बनाना है तो इसमें दो से तीन साल का समय लगेगा। तो क्या हम जब तक इंतजार करते रहेंगे।

चूंकि सुप्रीम कोर्ट की भावना है कि लोगों को नुकसान इन आवारा कुत्तों की वजह से न हो इसलिए स्थानीय निकाय और प्राधिकरणों को चाहिए कि वह ऐसे स्थानों की तलाश करें जो उपयोग नहीं हो रहे हैं। ऐसे में कुछ ऐसे स्कूल हो सकते हैं जो दूसरी इमारत बनने के कारण अनुपयोगी हो गए हैं

सामुदायिक केंद्र हो सकते हैं जो बुकिंग न होने के कारण अनुपयोगी हो रहे हैं। ऐसे में पहले तो कोशिश करनी चाहिए कि यह स्थान आबादी से दूर हो। अगर, आबादी से दूर नहीं है तो इन स्थानों पर साउंड प्रूफ सिस्टम लगाकर डॉग शेल्टर के तौर पर विकसित किया जा सकता है और इसे कम से आगामी एक माह में तैयार कर उपयोग में लाया जा सकता है।

इससे क्या होगा कि कुछ हद तक खतरनाक कुत्तों को जब शेल्टर होम में डाला जाएगा तो लोगों की सुरक्षा बढ़ेगी। वहीं, लोगों पर हमले होने के मामले कम होंगे तो लोगों में भी इन जानवरों के प्रति दयाभाव बढ़ेगा।

इस बीच स्थानीय निकायों को चाहिए कि स्थायी शेल्टर होम के लिए जगह की तलाश करें औऱ फंड की व्यवस्था करके स्थायी शेल्टर होम बनाए। जिसमें इन कुत्तों के बंध्याकरण, टीकाकरण, खाने, टहलने,नाहाने आदि का स्थान हो। क्योंकि एक समय बाद जब यह कुत्ते शेल्टर होम में होंगे तो इनमें अक्रामक पन कम हो जाएगा।

समय से देखभाल के कारण सहज होने से इन कुत्तों को भी खेलने आदि की इच्छा होगी। इसलिए उसको देखते हुए यह शेल्टर होम बनें। इसके साथ ही यह जरूर हो कि जो भी कुत्ते को हम शेल्टर होम में डाले तो उस शेल्टर होम को पूरी तरह सीसीटीवी की निगरानी में होना चाहिए। ताकि कोई भी सवाल न उठे और पारदर्शिता से सारे कार्य हो।

अदालत की सख्ती, फिर भी सिस्टम की सुस्ती

संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत देश के हर नागरिक को बिना किसी डर के सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षित घूमने का अधिकार है। लेकिन जब हम जमीनी हकीकत देखते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट के इन ऐतिहासिक और स्पष्ट आदेशों के बावजूद दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद और गुरुग्राम के स्थानीय निकायों व प्रशासन की चाल बेहद सुस्त और निराशाजनक नजर आती है।

सुप्रीम कोर्ट की बार-बार फटकार के बाद भी आखिर प्रशासन की रफ्तार इतनी धीमी क्यों है? इसके पीछे प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी के साथ-साथ कई व्यावहारिक कारण भी हैं

क्या आप मानते हैं कि दिल्ली समेत एनसीआर के स्थानीय निकाय खतरनाक आवारा कुत्तों को सार्वजनिक स्थानों से हटाने को लेकर उदासीन हैं?

  • हां : 99
  • नहीं : 1

क्या एनसीआर में खतरनाक आवारा कुत्तों की पहचान करने और उन्हें सार्वजनिक स्थानों से हटाने में लापरवाही के लिए जवाबदेही तय होनी चाहिए?

  • हां : 95
  • नहीं : 5

19 मई 2026 का सुप्रीम कोर्ट का आदेश

  • पुराने आदेश में बदलाव से इन्कार
  • स्कूल, अस्पताल और सार्वजनिक संस्थानों से कुत्ते हटाने का निर्देश बरकरार।
  • पकड़े गए कुत्तों को उसी स्थान पर वापस नहीं छोड़ा जाएगा
  • कोर्ट ने दोहराया कि सार्वजनिक संस्थानों से हटाए गए कुत्तों को बंध्याकरण और टीकाकरण के बाद भी उसी जगह वापस नहीं छोड़ा जा सकता।
  • मानव जीवन को सर्वोच्च प्राथमिकता
  • कोर्ट ने देश में बढ़ते डॉग बाइट मामलों को गंभीर बताया।
  • रेबीजग्रस्त और खतरनाक कुत्तों के लिए इच्छामृत्यु की अनुमति।
  • हर जिले में एनिमल बर्थ कंट्रोल सेंटर बनाने का निर्देश
  • देश के सभी हाई कोर्ट अपने-अपने राज्यों में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुपालन की निगरानी करें।
  • सुप्रीम कोर्ट ने बंध्याकरण और टीकाकरण कार्यक्रम को प्रभावी बनाने के लिए प्रत्येक जिले में पर्याप्त एबीसी केंद्र स्थापित बने।

10 माह में कुछ नहीं किया

  1. 1500 कुत्तों की क्षमता का डॉग शेल्टर बनाने का निर्णय लिया, जमीनी स्तर पर कोई काम नहीं हुआ।
  2. 733 तो एनडीएमसी ने 100 फीडिंग प्वाइंट निर्धारित किए गए। एमसीडी से नहीं कर रहा ये काम।
  3. सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को हटाना था लेकिन अभी तक कोई कार्य नहीं हो पाया है

हिंसक होते कुत्ते

  • अप्रैल 2026: नोएडा में रक्षा मंत्रालय के रिटायर्ड अधिकारी को आवारा कुत्ते ने 13 जगह काटा।
  • मार्च 2026: सेक्टर-117, नोएडा में 12 वर्षीय बच्ची पर हमला
  • जनवरी 2026: अजनारा होम्स सोसासटी में आठ साल के बच्चे को चार कुत्तों ने घेरा
  • 26 जुलाई 2025 : पूठकलां में छह वर्षीय बच्ची को कुत्ते ने काटा, रेबीज से संक्रमित होने से मौत
  • 19 मार्च,2025 : सेक्टर छह फरीदाबाद में आवारा कुत्तों के हमले में सेवानिवृत्त आइएएस अधिकारी डा. प्रवीण कुमार गंभीर घायल
  • फरवरी 2025 : गौड़ सिटी एवेन्यू 12 सोसायटी बेसमेंट में महिला पर आवारा कुत्तों ने किया हमला।
  • 22 मार्च 2024 : फरीदाबाद में बड़खल नगर निवासी महिला मंजू को आवारा कुत्तों के झुंड काट कर गंभीर घायल कर दिया

गाजियाबाद में अब तक एक साल में क्या किया?

  • 60000 आवारा कुत्ते
  • शेल्टर होम के लिए भूमि चिह्नित
  • तीन एनीमल बर्थ कंट्रोल बनाए, जिनमे दो चल रहे
  • कुत्तों को वैक्सीन लगाने और उनकी संख्या पता लगाने को कुत्तों में चिप लगाने के लिए टेंडर किया।

कुत्तों ने काटा

  • वर्ष 2024 : 106,532
  • वर्ष 2025 : 138,557
  • 65911 लोगों ने कुत्तों को काटा है (2026 में)

गौतमबुद्ध नगर

  • 1.5 लाख आवारा कुत्ते
  • 15 हजार कुत्ते आक्रामक
  • कुत्तों की सटीक संख्या को सर्वे
  • आक्रामक कुत्तों को रखने के लिए दो शेल्टर की योजना तैयार हुई।
  • 1500 फीडिंग प्वाइंट बनाने के लिए टेंडर प्रक्रिया चल रही है।

कुत्तों ने काटा

  • वर्ष 2024
  • वर्ष 2025
  • 61 हजार (2026 में अब तक)

फरीदाबाद

  • आवारा कुत्ते : 40 हजार
  • खूंखार : 2000
  • भूपानी गांव में शेल्टर होम बन रहा
  • 500 कुत्तों का बंध्याकरण किया गया

कुत्तों ने काटा

  • वर्ष 2024 : 22320
  • वर्ष 2025 : 23800
  • 23800, (2026 में अब तक)

गुरुग्राम

  • 35 हजार लगभग
  • गुरुग्राम नगर निगम द्वारा चार डॉग शेल्टर बनाए गए।
  • चार एनिमल बर्थ कंट्रोल सेंटर बनाए गए।

कुत्तों ने काटा

  • वर्ष 2024 : 15373
  • वर्ष 2025 : 19777
  • 10,830 (2026 में अब तक)

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