अंटार्कटिका महाद्वीप से जुड़ा था भारत, आंध्रप्रदेश में हुई एक स्टडी में चौंकाने वाला खुलासा

जरा सोचिए, आप आंध्र प्रदेश या ओडिशा के खूबसूरत पूर्वी घाट (Eastern Ghats) पर घूम रहे हों और आगे बढ़ते ही अचानक आपके सामने बंगाल की खाड़ी के बजाय अंटार्कटिका के विशाल, बर्फीले पहाड़ आ जाएं। आज भले ही यह किसी हॉलीवुड फिल्म की कल्पना लगे, लेकिन करोड़ों साल पहले हमारी धरती का भूगोल हूबहू ऐसा ही था।

दशकों से दुनिया भर के भूविज्ञानी (Geologists) ग्लोब और महाद्वीपों के नक्शों को देखकर यह अनुमान लगा रहे थे कि भारत और अंटार्कटिका कभी एक ही विशाल पहेली के दो टुकड़े थे। अब, भारतीय वैज्ञानिकों ने आंध्र प्रदेश से एक ऐसा “ठोस और अकाट्य सबूत” खोज निकाला है, जिसने इस थ्योरी पर मुहर लगा दी है।

नई खोज से यह साबित होता है कि भारत और अंटार्कटिका कभी भौतिक रूप से एक साथ जुड़े हुए थे और एक विशाल पर्वत श्रृंखला बनाते थे, जिसे ‘रेनर-पूर्वी घाट ओरोजेन’ के नाम से जाना जाता है, जो लोग इस बारे में नहीं जानते, उनके लिए बता दें कि ‘रेनर प्रांत’ आज के पूर्वी अंटार्कटिका में स्थित है।

कई देशों के शोधकर्ता हुए शामिल

शोधकर्ताओं ने पाया कि इन दोनों क्षेत्रों की चट्टानों की उम्र, रासायनिक निशान और खनिज संरचना एक जैसी है। उन्होंने यह भी पाया कि इन चट्टानों ने भूवैज्ञानिक इतिहास के उन्हीं तीन चरणों को पार किया है, जिससे इस बात का पुख्ता सबूत मिलता है कि पूर्वी भारत और पूर्वी अंटार्कटिका लाखों साल पहले अलग होने से पहले आपस में जुड़े हुए थे।

इस शोध टीम में प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी, कोलकाता के शुभदीप रॉय, शंकर बोस, सायंतिका घोष, स्नेहा मुखर्जी, निलंजना सरकार और जे अमल देव, क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी, ऑस्ट्रेलिया, नेशनल सेंटर फॉर अर्थ साइंस स्टडीज़, तिरुवनंतपुरम और कोरिया पोलर रिसर्च इंस्टीट्यूट, रिपब्लिक ऑफ कोरिया के शोधकर्ता शामिल थे।

स्टडी के दौरान शोधकर्ताओं ने ‘ग्रैनुलाइट्स’ नामक चट्टानों का अध्ययन किया। ये एक प्रकार की मेटामॉर्फिक चट्टानें हैं, जो पृथ्वी के बहुत अंदर, अत्यधिक गर्मी और दबाव में बनती हैं।

इसी वजह से, ये चट्टानें उन प्राचीन घटनाओं का रिकॉर्ड अपने अंदर सहेजकर रखती हैं जो पृथ्वी की पपड़ी (crust) के बहुत अंदर घटित हुई थीं।

समाचार पत्र TOI से बात करते हुए, प्रेसिडेंसी यूनिवर्सिटी में प्राकृतिक और गणितीय विज्ञान संकाय के डीन प्रो. शंकर बोस ने बताया कि टीम ने आंध्र प्रदेश के विजयनगरम-सलूर क्षेत्र में जिरकॉन, गार्नेट और मोनाजाइट जैसे खनिजों की जांच के लिए खनिज विश्लेषण की उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल किया।

जिरकॉन में अधिक गर्मी और दबाव झेलने की झमता

भूविज्ञान विभाग के फैकल्टी सदस्य ने बताया, “खास बात यह है कि जिरकॉन अपनी जबरदस्त गर्मी और दबाव झेलने की क्षमता के लिए मशहूर है, जो दूसरे खनिजों को पूरी तरह खत्म कर सकती है। अपनी इसी मजबूत बनावट की वजह से, ज़िरकॉन इन चट्टानों के अंदर एक छोटे ‘टाइम कैप्सूल’ का काम करता है।”

उन्होंने कहा, “जिरकॉन क्रिस्टल के अंदर मौजूद यूरेनियम और लेड जैसे रेडियोएक्टिव तत्वों के क्षय (decay) की मदद से हम एक विस्तृत टाइमलाइन तैयार कर पाए, जिससे उन घटनाओं की सटीक जानकारी मिली जो करोड़ों से लेकर अरबों साल पहले पूर्वी घाट इलाके में घटी थीं।”

तीन चरणों में हुए बदलाव

शोधकर्ता प्रोफेसर बोस ने बताया कि विजयनगरम और सालुर से मिली चट्टानों में भूवैज्ञानिक इतिहास के वही तीन मुख्य चरण दर्ज थे, जिनकी पहचान पहले ही पूर्वी अंटार्कटिका में की जा चुकी थी।

पहला चरण लगभग 1,000 से 990 मिलियन साल पहले हुआ था। इस दौरान, चट्टानें पृथ्वी की पपड़ी (crust) के काफी अंदर, लगभग 1,000 डिग्री सेल्सियस के बेहद ऊंचे तापमान के संपर्क में आईं, जो लगभग लावा जितना ही गर्म था।

जब वे भूभाग, जो आगे चलकर भारत और अंटार्कटिका बने, आपस में टकराए, तो उन्होंने एक विशाल पर्वत श्रृंखला का निर्माण किया, जिसे ‘रेनर-पूर्वी घाट ओरोजेन’ के नाम से जाना जाता है।

दूसरा चरण लगभग 950 से 890 मिलियन साल पहले हुआ था। वैज्ञानिक इसे ‘पुनर्निर्माण’ (reworking) का दौर बताते हैं। चट्टानें फिर से गर्म हुईं या और भी गहराई में दब गईं, और उनकी खनिज संरचनाएं एक बार फिर बदल गईं। इतना लंबा और जटिल इतिहास, महाद्वीपों की टक्कर से बनी बड़ी पर्वत श्रृंखलाओं की एक आम विशेषता है।

तीसरा चरण काफी बाद में, लगभग 570 से 540 मिलियन साल पहले हुआ था। इस दौरान, रासायनिक रूप से समृद्ध तरल पदार्थ चट्टानों की दरारों और परतों के बीच से होकर गुजरे।

इस तरल गतिविधि ने अपने पीछे एक विशिष्ट ‘रासायनिक निशान’ (chemical fingerprint) छोड़ दिया। शोधकर्ताओं का मानना है कि इसका संबंध गोंडवाना के निर्माण से जुड़ी दूरवर्ती ‘टेक्टोनिक शक्तियों’ से था।

प्रोफेसर बोस के मुताबिक, भले ही मुख्य टकराव कहीं और हो रहे थे, लेकिन तनाव और तरल पदार्थों की हलचल इस क्षेत्र तक पहुंची और इसने चट्टानों को इस तरह से बदल दिया कि उन्हें पहचाना जा सके।

प्रो. बोस ने आगे कहा, ‘भारतीय और अंटार्कटिक, दोनों ही नमूनों में तरल पदार्थों से जुड़ा एक जैसा ही निशान मिलता है, जिससे इस बात को और बल मिलता है कि इन दोनों का भूवैज्ञानिक इतिहास एक ही रहा है।’

विशाल विभाजन और खिसक गए महाद्वीप

पहले के अध्ययनों के अनुसार, लगभग 130 से 150 मिलियन वर्ष पहले, डायनासोरों के युग में, विशाल महाद्वीप ‘गोंडवाना’ टूटना शुरू हो गया था। एक विशाल दरार खुली और धीरे-धीरे चौड़ी होती गई, जो आगे चलकर ‘हिंद महासागर’ बन गई।

भारत उत्तर की ओर एशिया की तरफ खिसकने लगा, जबकि अंटार्कटिका दक्षिण की ओर ध्रुव की तरफ बढ़ने लगा। कभी आपस में जुड़ी हुई पर्वतीय श्रृंखला टूटकर अलग हो गई और अलग-अलग महाद्वीपीय प्लेटों पर बहकर दूर चली गई।

आज, हजारों किलोमीटर का महासागर इन दोनों क्षेत्रों को एक-दूसरे से अलग करता है। वैज्ञानिक आज भी इनके साझा अतीत का पता लगा सकते हैं, क्योंकि इन चट्टानों में उस सुदूर अतीत का भूवैज्ञानिक इतिहास सुरक्षित है।”

यह खोज क्यों मायने रखती है?

प्रो. बोस ने बताया, “आज पूर्वी घाटों के नीचे की जमीन भले ही स्थिर दिखाई देती हो, लेकिन ये चट्टानें एक अरब वर्षों के दौरान हुई अत्यधिक गर्मी, जमीन की गहराई में दबे रहने, रासायनिक बदलाव और महाद्वीपीय यात्रा की कहानी बयां करती हैं।

इन्होंने 1,000 डिग्री सेल्सियस के करीब तापमान को भी सहन किया, एक से ज़्यादा बार इनमें बदलाव हुए और बाद में ये उस विशाल भूभाग का हिस्सा बन गईं, जो अंटार्कटिका में मौजूद अपने प्राचीन जुड़वां हिस्से से बहुत दूर खिसक गया”

बोस के मुताबिक इस ‘भूवैज्ञानिक घड़ी’ के अलग-अलग हिस्सों को जोड़कर, वैज्ञानिक इस बात का बेहतर अनुमान लगा सकते हैं कि वर्तमान भूवैज्ञानिक प्रक्रियाएं किस तरह आगे बढ़ेंगी। यह प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन और भूकंप जैसे भूवैज्ञानिक जोखिमों का आकलन करने के लिए बेहद जरूरी है।

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