श्रीनगर की चहल-पहल वाली सड़कों पर, जहां आजकल की गाड़ियां सड़कों पर भरी रहती हैं और ज़िंदगी तेज़ी से भागती है, वहीं एक बार फिर पुराने जमाने की एक खूबसूरत झलक फिर से दिखाई थी। घोड़े की टापों की लयबद्ध आवाज और लकड़ी के पहियों की हल्की चरमराहट कश्मीर की खूबसूरत वादियों में एक बार फिर सुनी जा सकती है। कश्मीर घूमने आए पर्यटक भी इसका पूरा लुत्फ उठाते नजर आ रहे हैं।
पारंपरिक घोड़ा गाड़ी, जिसे तांगा कहते हैं, शहर में वापस आ गया है, जो पुराने और सादे ज़माने की यादें ताज़ा कर रही है। यह वापसी श्रीनगर के जमालट्टा के रहने वाले 70 साल के गुलाम रसूल कुमार की वजह से मुमकिन हुई है। श्रीनगर की सड़कों पर स्मार्ट बसों व मॉडर्न ट्रांसपोर्ट की हलचल के बीच तांगे की एक धीमी, रिदम वाली चाल ने फिर से सबका ध्यान खींचना शुरू कर दिया है।
सड़कों पर दौड़ता यह तांगा युवा वर्ग, खासकर जेन-जी के लिए आकर्षण से कम नहीं है। कोई सवारी का मजा लेते हुए सेल्फी ले रहा है तो कोई सोशल मीडिया पर रील्स बनाकर इसे खूब वायरल कर रहा है। इन फोट्स-रील्ड को देख कमंट करने वाले बड़े-बुजुर्ग भी पुरानी यादों को याद करते हुए लिख रहे हैं कि कभी यह सवारी कभी हमारी परंपरा का हिस्सा हुआ करती थी।
पारंपरिक सवारी को फिर से स्वीकार करें लोग
तांगा जो कभी घाटी में यातायात का मुख्य साधन था और शहर व गांव के अधिकांश लोग एक जगह से दूसरी जगह पर जाने के लिए प्रयोग करते थे, आधुनिकता की भेंट चढ़कर सड़कों से गायब हो गया था, लेकिन अब यह फिर से यहां की सड़कों पर लौट आया है। पेशेवर तांगेबान गुलाम रसूल कुमार ने कहा कि तांगे को फिर से लाने के दो मकसद हैं। एक तो अपनी इस पारंपरिक सवारी को फिर से लोगों के बीच लाना और दूसरा पेट्रोल डीजल के संकट के दौर में इसे विकल्प के तौर पर प्रयोग करना।
कुमार ने कहा कि दशकों तक, यह घोड़ा गाड़ियां बाजारों, मोहल्लों और नदी के किनारों से यात्रियों को ले जाती थीं, जब सड़कों पर मोटर गाड़ियां नहीं थीं। समय के साथ, वह धीरे-धीरे गायब हो गए। उनकी जगह कारों, ऑटो रिक्शा और बसों ने ले ली, अब यह सवारियां सिर्फ पुरानी तस्वीरों या फिर यादों में ही बची हैं। मेरी कोशिश है कि लोग अपनी इस पारंपरिक सवारी को फिर से स्वीकार करें। यह केवल सवारी ही नहीं बल्कि हमारी संस्कृति का एक प्रमुख हिस्सा है।
सरकार फिर से तांगे चलाने की अनुमति दे
सनद रहे कि गुलाम रसूल फिलहाल शहर के डाउनटाउन इलाकों में ही अपने तांगे की सेवा दे रहे हैं लेकिन उनका कहना है कि उनके पास कुछ तांगे और हैं जिनके शहर के अन्य इलाकों में भी यात्रियों के लिए मुहैया कराएंगे। उन्होंने सरकार से अनुरोध किया कि वह तांगेबानों को अपनी सेवाएं उपलब्ध कराने की अनुमति दें।
उन्होंने कहा कि मेरे जैसे कई तांगेबान सेवाएं देना चाहते हैं। इससे हमारी रोजी रोटी का भी बंदोबस्त हो जाएगा और लोगों को भी राहत मिलेगी। इधर श्रीनगर की सड़कों पर दौड़ रहा तांगा लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। लोग इसे देखने के लिए रुकते हैं, सवारी करने की इच्छा जाहिर करते हैं। युवा तस्वीरें लेते हैं और इसकी सवारी का मजा भी लेते हैं।
वहीं स्थानीय लोगों का कहना है कि यह अनुभव केवल एक सवारी से कहीं ज्यादा है। यह दौड़ भरी इस जिंदगी में एक पल के लिए रुकने का एहसास कराता है, जो शहर के बदलते माहौल में बहुत कम देखने को मिलता है। मोहम्मद शफी कंडू नामक एक 56 वर्षीय व्यक्ति ने कहा, तांगा तो उनकी पहचान है।


