एनएसई ने करंसी, कमोडिटी, कैश और इक्विटी डेरिवेटिव सेगमेंट में नैनोसेकंड स्तर पर ऑर्डर एक्नॉलेजमेंट की शुरुआत की

वॉल्यूम के आधार पर दुनिया के सबसे बड़े डेरिवेटिव्स एक्सचेंज, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया (एनएसई) ने 11 अप्रैल, 2026 से करंसी डेरिवेटिव्स, कमोडिटी डेरिवेटिव्स, कैश (कैपिटल मार्केट) और इक्विटी डेरिवेटिव्स सेगमेंट में ‘इमीडिएट एक्नॉलेजमेंट’ फीचर लागू किया है। इस नई प्रणाली के तहत अब ऑर्डर का एक्नॉलेजमेंट नैनोसेकंड में प्राप्त होगा, जो पहले के लगभग 100 माइक्रोसेकंड के सिस्टम रिस्पॉन्स टाइम से कहीं अधिक तेज है।

यह उपलब्धि एनएसई के ट्रेडिंग सिस्टम में एक महत्वपूर्ण सुधार को दर्शाती है, जो भारत को वैश्विक एक्सचेंज टेक्नोलॉजी में और मजबूत बनाती है। यह एक्सचेंज की पारदर्शी, तेज और विश्वस्तरीय कैपिटल मार्केट सिस्टम बनाने की प्रतिबद्धता को भी आगे बढ़ाती है।

नए और बेहतर प्रोसेस के तहत, एनएसई के ट्रेडिंग सिस्टम को भेजे गए हर ऑर्डर को नैनोसेकंड में तुरंत एक्नॉलेजमेंट मिल रहा है। यह रियल-टाइम पुष्टि ऑर्डर मिलने के बाद सामान्य प्रक्रिया के अनुसार कन्फर्मेशन या रिजेक्शन के मैसेज से आगे बढ़ती है, जिससे मार्केट में काम करने वाले लोग अपने ऑर्डर की जानकारी तुरंत ट्रैक कर सकते हैं और पहले से ज्यादा भरोसे और पारदर्शिता के साथ काम कर सकते हैं। वर्तमान में, दुनिया का कोई अन्य एक्सचेंज नैनोसेकंड में रिस्पॉन्स देने का दावा नहीं करता है।

‘इमीडिएट एक्नॉलेजमेंट’ फीचर को चरणबद्ध तरीके से लागू किया गया है
– करंसी डेरिवेटिव्स (सीडी) – 12 जुलाई, 2025 से लागू
– कमोडिटी डेरिवेटिव्स (सीओ) – 13 दिसंबर, 2025 से लागू
– कैपिटल मार्केट / इक्विटीज (सीएम) – 11 अप्रैल, 2026 से लागू
– इक्विटी डेरिवेटिव्स (एफओ) – 11 अप्रैल, 2026 से लागू

कैश और इक्विटी डेरिवेटिव्स सेगमेंट में इसके विस्तार के दौरान एक फेज़वाइज को-एक्सिस्टेंस पीरियड भी रखा गया है, ताकि सदस्य मौजूदा एन्क्रिप्शन सिस्टम से नए सिस्टम में आसानी से ट्रांजिशन कर सकें।

बेहतर पारदर्शिता और रियल-टाइम ऑर्डर एक्नॉलेजमेंट से ऑर्डर मिलने की जानकारी तुरंत मिलती है, जिससे पूरे ऑर्डर प्रोसेस में किसी तरह की अनिश्चितता नहीं रहती। अब मार्केट से जुड़े लोग हर ऑर्डर को रियल-टाइम में ट्रैक कर सकते हैं, जिससे फैसले तेजी से लिए जा सकते हैं और जोखिम को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है। फेजवाइज को-एक्सिस्टेंस मॉडल के चलते ट्रेडिंग पर कोई असर नहीं पड़ेगा और नए सिस्टम में बदलाव भी आसानी से हो जाएगा।

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