सुप्रीम कोर्ट नफरती भाषणों से संबंधित कई याचिकाओं पर बुधवार को फैसला सुनाएगा। सुप्रीम कोर्ट की 29 अप्रैल की केस सूची के अनुसार जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ फैसला सुनाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने 20 जनवरी को कहा था कि वह 2021 से लंबित नफरती भाषणों से संबंधित अधिकांश याचिकाओं का निपटारा कर देगा, जिनमें न्यायालय ने पुलिस को स्वत: संज्ञान लेते हुए प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया था।
केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा न्यायालय के निर्देशों का पर्याप्त रूप से अनुपालन करने की बात कहे जाने के बाद, पीठ ने विभिन्न व्यक्तियों द्वारा दायर इन याचिकाओं पर सुनवाई पूरी कर ली थी।
हर धार्मिक संस्था के लिए नियम जरूरी, अराजकता नहीं हो सकती : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि किसी धार्मिक संस्था के प्रबंधन के अधिकार का मतलब यह नहीं है कि उसके संचालन के लिए कोई ढांचा न हो। प्रबंधन को लेकर अराजकता की स्थिति नहीं हो सकती।
धार्मिक संस्थाओं के कामकाज के लिए एक व्यवस्था एवं नियम होने चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि धार्मिक गतिविधियों के नाम पर सड़कों को अवरुद्ध नहीं किया जा सकता। किसी भी धार्मिक समुदाय को पूजा-पाठ करने के तरीके में स्वायत्तता है और अदालत उसके धार्मिक मामलों में फैसला नहीं सुना सकती, लेकिन अगर किसी पंथनिरपेक्ष गतिविधि पर असर पड़ रहा है, तो सरकार हस्तक्षेप कर सकती है।
नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह टिप्पणी केरल के सबरीमाला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की।
पीठ में प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्ला, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस अगस्टीन जार्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जोयमाल्या बागची शामिल हैं।
हजरत ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया की दरगाह से जुड़ी चिश्ती निजामी परंपरा के वंशज पीरजादा सैयद अल्तमश निजामी की ओर से पेश अधिवक्ता निजाम पाशा ने कहा कि दरगाह वह स्थान होता है, जहां किसी संत को दफनाया गया हो।
उन्होंने कहा, ‘इस्लाम में मृत्यु के बाद संतों की स्थिति को लेकर अलग-अलग मत हैं, लेकिन सूफी परंपरा में उस स्थान के प्रति गहरी श्रद्धा होती है, जहां किसी संत को दफनाया जाता है।’
पाशा ने दलील दी कि किसी धार्मिक संस्था में प्रवेश को विनियमित करने का अधिकार प्रबंधन का हिस्सा है। इस पर जस्टिस अमानुल्ला ने कहा कि प्रबंधन के अधिकार का मतलब ढांचे का अभाव नहीं हो सकता और हर चीज के लिए एक व्यवस्था होनी चाहिए।


