मौसम, पर्यावरण प्रदूषण और अतिक्रमण की चुनौतियों का सामना कर रहे कश्मीर के केसर के लिए अब साही एक नया दुश्मन बनकर सामने आ रहा है। जब तक किसानों को इसका पता चलता है, तब तक वह जमीन के नीचे से केसर के कंद- केसर की जड़ों को खाकर उन्हें खोखला कर चुका होता है।
कृषि एवं बागवानी विभाग और शेरे कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के विज्ञानियों ने भी केसर के लिए पैदा हुए इस नए संकट की पुष्टि की है। इसे देखते हुए सरकार ने साही से केसर को बचाने के लिए एक बहुस्तरीय रणनीति पर काम शुरु कर दिया है।
केसर दुनिया के सबसे महंगे मसालों में एक है। कश्मीर का केसर अपनी खुशबू और औषधीय गुणों के कारण दुनिया में अन्यत्र पैदा होने वाले केसर से ज्यादा बेहतर माना जाता है। कश्मीरी केसर को जीआई टैग भी प्राप्त है। घाटी में केसर की खेती मुख्यत: दक्षिण कश्मीर मे जिला पुलवामा के पांपोर और अवंतीपोरा इलाके में होती है। इसके अलावा पांपोर के साथ जिला बडगाम के भी कुछ हिस्सों में केसर के खेत हैं।
पैदावार 8.0 मीट्रिक टन से घटकर 2.6 मीट्रिक टन पहुंची
बीते एक दशक के दौरान कश्मीर में केसर उत्पादन घटा है। जम्मू कश्मीर के वित्तीय आयुक्त (राजस्व) कार्यालय द्वारा प्रदान किए गए अनुमान के अनुसार, 2010-11 में प्रदेश में केसर की पैदावार 8.0 मीट्रिक टन से घटकर 2023-24 में 2.6 मीट्रिक टन रह गई है।
पांपोर के विधायक हसनैन मसूदी ने गत दिनों प्रदेश विधानसभा के सत्र में भी यह मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि केसर के लिए अब जमीन के नीचे से भी खतरा शुरु हो चुका है। किसानों की फसल को साही चट कर रहा है। वह केसर की जड़ों-कंद को खा रहा है और फसल नहीं हो रही है। कई किसानों की 80 प्रतिशत से ज्यादा फसल बर्बाद हुई है।
पांपोर में साही ने अधिक मचाई तबाही
वन एवं पर्यावरण मंत्री जावेद अहमद राणा ने कहा कि पांपोर में साही की मौजूदगी की पुष्टि करते हुए बताया कि हमें नहीं पता कि यह जानवर कश्मीर में कैसे पहुंचा, क्योंकि पहले यह जानवर पांपोर में नहीं था। हम इसका पता लगा रहे हैं। हसनैन मसूदी ने कहा कि पांपोर के साथ सटा खिरयु इलाका जहां पहले कभी चार हजार किलो केसर पैदा होता था अब एक दो सौ किलो केसर नहीं मिल रहा है, वहां खेत अनुपजाऊ हो गए हैं।
वन्यजीव विशेषज्ञ इस बढ़ोतरी के पीछे पारिस्थितिक बदलावों को जिम्मेदार मानते हैं। वनों की कटाई ने प्राकृतिक आवास को कम कर दिया है, जिससे साही खेती वाले इलाकों की ओर बढ़ रहे हैं। शिकारी जीवों की संख्या में कमी से उनकी आबादी पर नियंत्रण भी खत्म हो गया है। गर्म सर्दियों ने उनके भोजन खोजने की अवधि बढ़ा दी है, जिससे वे सालभर अधिक सक्रिय रहते हैं।
समस्या से निपटने के लिए कार्ययोजना तैयार
नियंत्रण के विकल्प सीमित हैं। वन्यजीव कानून के तहत संरक्षित प्रजाति होने के कारण साही को मारा नहीं जा सकता, जिससे फसल नुकसान मानव-वन्यजीव संघर्ष का रूप ले रहा है। कृषि, बागवानी एवं ग्रामीण विकास मंत्री जावेद अहमद डार ने कहा कि हमने इस समस्या से निपटने के लिए विभिन्न विभागों के समन्वय से कार्ययोजना तैयार की है।
जम्मू और कश्मीर राजस्व विभाग और पंचायती राज संस्थाओं के सहयोग से बिलों, झाड़ियों और घनी वनस्पति की सफाई का अभियान चलाया जाएगा, ताकि साही के छिपने के स्थानों को कम किया जा सके। इसके साथ ही किसानों को फसल सुरक्षा के लिए कई व्यावहारिक उपाय अपनाने की सलाह दी गई है।
उन्हें खेतों के नीचे गहरी जालीदार बाढ़ लगाने, बागों मेंपेड़ों के तने के निचले हिस्सों में एल्युिमिनियम की चादर लगाने और उन्हें रिफ्लेकटिव काेटिंग करने को कहा है। इसके अलावा आइरिस,वर्मवुड और जंगली रतालु जैसी प्राकृतिक वस्पतियों को लगाने के लिए कहा है, जो साही को दूर रखती हैं।
कृषि विभाग ने किसानों को दी हिदायत
ऑर्गेनिक रिपेलेंट्स, नेफ़थलीन जैसे गंध-आधारित डिटरेंट, और मोशन-एक्टिवेटेड लाइट व साउंड सिस्टम के उपयोग को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। किसानों को काली मिर्च आधारित जैविक रिपेलेंट का छिड़काव करें; बिलों के पास नेफ़्थलीन रखें। उन्होंने बताया कि कृषि विभाग, पंपोर स्थित केसर रिसर्च स्टेशन के सहयोग से साही व अन्य कारणों से फसल नुकसान का वैज्ञानिक मूल्यांकन कर रहा है, ताकि दीर्घकालिक समाधान विकसित किए जा सकें।


