मातृभूमि योजना: यूपी के गांवों में बाप-दादा का नाम जिंदा रखने में बेटे ‘फेल’

शासन की महत्वाकांक्षी मातृभूमि योजना गोरखपुर जिले में अपेक्षित गति नहीं पकड़ पा रही है। प्रवासी लोगों को अपने गांव के विकास से जोड़ने के उद्देश्य से शुरू की गई इस योजना का लाभ अभी तक सीमित दायरे में ही सिमटा हुआ है। करीब पांच वर्ष बीतने के बावजूद जिले की केवल चार-पांच ग्राम पंचायतों में ही छोटे स्तर पर विकास कार्य हो सके हैं, जिससे योजना की प्रभावशीलता पर सवाल उठने लगे हैं।

योजना के तहत विकास कार्यों में 60 प्रतिशत लागत संबंधित लाभार्थी या संस्था द्वारा और 40 प्रतिशत राज्य सरकार द्वारा वहन किए जाने का प्रविधान है। इसके अंतर्गत सामुदायिक भवन, पुस्तकालय, पेयजल व्यवस्था, तालाब सुंदरीकरण, खेल मैदान, स्वास्थ्य केंद्र, सड़क, सोलर लाइट, सीसीटीवी, ओपन जिम, बस स्टैंड, आंगनबाड़ी केंद्र समेत कई आधारभूत सुविधाओं के निर्माण की अनुमति दी गई है। इसके बावजूद अधिकांश प्रवासी इसमें रुचि नहीं दिखा रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि नई पीढ़ी का अपने गांव और पूर्वजों की विरासत से भावनात्मक जुड़ाव कमजोर होना इसकी बड़ी वजह है। जो लोग रोजगार या व्यवसाय के सिलसिले में बड़े शहरों या विदेशों में बस गए हैं, वे गांव के विकास में आर्थिक योगदान देने के प्रति उतने सक्रिय नहीं दिख रहे। जबकि यह वर्ग आर्थिक रूप से सक्षम माना जाता है।

दूसरी ओर, योजना के प्रभावी क्रियान्वयन में प्रचार-प्रसार की कमी भी एक प्रमुख कारण बनकर उभरी है। ग्रामीण स्तर पर न तो इसकी पर्याप्त जानकारी पहुंच पाई है और न ही प्रवासियों के लिए कोई सशक्त और व्यवस्थित प्लेटफार्म विकसित किया जा सका है, जिससे वे आसानी से जुड़ सकें।

शासन स्तर पर यह व्यवस्था की गई है कि यदि कोई व्यक्ति या संस्था ग्राम पंचायत क्षेत्र में विकास कार्य कराना चाहती है, तो पंचायत राज अधिनियम की धारा-15 के तहत अनुमन्य कार्यों में सहयोग कर सकती है।

सहयोग करने वाले की ओर से अपने माता, पिता, दादा-दादी, भाई आदि का नाम शिलापट्ट पर प्रदर्शित करने का भी प्रविधान है, जिससे उन्हें सामाजिक पहचान मिल सके। इसके अलावा, निजी निवेश से कार्यों की गुणवत्ता, तकनीकी सहयोग और निगरानी में भी सुधार की संभावना जताई गई है।

इसके बावजूद पंचायतों में अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं। जानकारों का कहना है कि यदि योजना को गति देनी है तो प्रवासियों से भावनात्मक अपील, डिजिटल प्लेटफार्म की मजबूती और व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाना आवश्यक होगा। तभी यह योजना गांवों के समग्र विकास में सार्थक भूमिका निभा सकेगी।

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