भारतीय मुद्रा रुपये (Rupee Weakness) में गिरावट का सिलसिला जारी है और 19 मई को यह फिर से रिकॉर्ड निचले स्तरों पर पहुंच गया। दरअसल, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के चलते रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हो रहा है। रुपये की गिरावट पर करेंसी मार्केट के जानकारों का कहना है कि होर्मुज स्ट्रेट में संभावित व्यवधान को लेकर चिंताओं ने भारत की व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर आशंकाओं को और बढ़ा दिया है, क्योंकि देश खाड़ी देशों से कच्चे तेल के आयात पर अत्यधिक निर्भर है।
फॉरेन करेंसी ट्रेडर्स के अनुसार, तेल की बढ़ती कीमतों से भारत के आयात बिल पर दबाव बढ़ रहा है, जबकि वैश्विक अनिश्चितता के कारण निवेशकों का विश्वास कमजोर बना हुआ है।
आगे कैसी रहेगी रुपये की चाल?
सीआर फॉरेक्स एडवाइजर्स के अमित पबारी ने कहा, “बाजार के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ दिशा तय करना नहीं, बल्कि विश्वास बनाए रखना है। जब तक वैश्विक तनाव कम नहीं होता और विदेशी निवेश में स्थिरता नहीं आती, तब तक रुपया दबाव में कारोबार करता रहेगा और अस्थिरता का स्तर ऊंचा बना रहेगा।”


