भारत में प्रसव के दौरान होने वाले मातृ मृत्यु दर में 80 प्रतिशत की गिरावट, माताओं का बच रहा जीवन

भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र से एक ऐसी खबर आई है जो हर मां के चेहरे पर मुस्कान और देश के माथे पर गर्व का तिलक लगाती है। ‘द लांसेट’ जर्नल में प्रकाशित ‘ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज 2023’ के ताजा विश्लेषण के अनुसार, भारत ने पिछले तीन दशकों में अपनी मातृ मृत्यु दर (एमएमआर) को लगभग 80 प्रतिशत तक कम करने में सफलता हासिल की है। यह केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि हजारों माताओं के जीवन को बचाने की एक भावपूर्ण विजय गाथा है।

आंकड़ों की जुबानी: 1990 से 2023 तक का सफर साल 1990 के उस दौर में प्रति एक लाख जन्मों पर 508 माताओं की जान चली जाती थी। आज 2023 के विश्लेषण में यह संख्या घटकर 116 पर आ गई है। यदि हम भारत के अपने ‘सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम’ (एसआरएस) के 2021-23 के आंकड़ों को देखें, तो यह स्थिति और भी सुखद है, जहां एमएमआर मात्र 88 रह गया है।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र (यूएन-एमएमईआइजी) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने 1990 से अब तक 86 प्रतिशत की कमी दर्ज की है, जो 48 प्रतिशत के वैश्विक औसत से कहीं अधिक है। यह उपलब्धि भारत को 2030 तक ‘सतत विकास लक्ष्य’ के तहत निर्धारित 70 से कम एमएमआर के लक्ष्य के बेहद करीब ले आई है।

वैश्विक तुलना और चुनौतियां जहां भारत ने लंबी छलांग लगाई है, वहीं पड़ोसी देशों और अफ्रीकी राष्ट्रों की स्थिति अब भी चिंताजनक है। 2023 में पाकिस्तान में 10,300, इथियोपिया में 11,900 और नाइजीरिया में 32,900 माताओं की मृत्यु हुई।

भारत में यह आंकड़ा 24,700 रहा। शोधकर्ताओं का मानना है कि प्रसव के दौरान अत्यधिक रक्तस्त्राव और उच्च रक्तचाप मौत के सबसे बड़े कारण रहे हैं।

सुरक्षित भविष्य की ओर बढ़ते कदम प्रसव पूर्व जांच, सुरक्षित प्रसव सेवाएं और आपातकालीन प्रसूति देखभाल में सुधार ने इस बदलाव में मुख्य भूमिका निभाई है।

हालांकि, रिपोर्ट यह भी चेतावनी देती है कि कोविड-19 महामारी के दौरान टीकाकरण से पहले मातृ मृत्यु दर में अस्थायी वृद्धि देखी गई थी।

अब जबकि 2030 के लक्ष्य में पांच साल से भी कम समय बचा है, विशेषज्ञों का कहना है कि स्वास्थ्य प्रणालियों को और मजबूत करना होगा ताकि हर घर में ‘जच्चा-बच्चा’ दोनों सुरक्षित और स्वस्थ रहें। बहरहाल, यह प्रगति बताती है कि जब संकल्प मजबूत हो, तो मौत के आंकड़ों को मात देकर जीवन की नई इबारत लिखी जा सकती है।

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