विधानसभा चुनाव में इस बार भी उत्तर बंगाल में कई सीटों पर आदिवासी मतदाता निर्णायक स्थिति में हैं। खासकर दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी और अलीपुरद्वार जैसे जिलों में यह उम्मीदवारों की जीत और हार तय करते हैं।
आदिवासी समुदाय के लिए 16 सीटें आरक्षित
उत्तर बंगाल में 54 विधानसभा सीटों में आदिवासी समुदाय के लिए 16 सीटें आरक्षित हैं। यही वजह है कि भाजपा और तृणमूल कांग्रेस इस वोट बैंक पर नजर गड़ाए हुए हैं। इस बार चुनाव में इन्हीं दोनों के बीच मुख्य मुकाबला भी है।
पिछले विधानसभा चुनाव में तराई और डुवार्स इलाकों में तृणमूल काफी पिछड़ गई थी। कई आदिवासी बहुल सीटें भाजपा के खाते में चली गई थीं।
अब 2026 के चुनाव में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए तृणमूल ने आदिवासी चेहरों पर बड़ा दांव खेला है। पार्टी ने इन इलाकों में प्रमुख आदिवासी नेताओं को सीधे चुनावी मैदान में उतारकर भाजपा के मजबूत दुर्ग में सेंध लगाने की रणनीति अपनाई है।
इनको दिया गया टिकट
जलपाईगुड़ी जिले की माल सीट से जनजाति कल्याण मंत्री बुलूचिक बड़ाइक को टिकट दिया गया है, जबकि नागराकाटा से पंचायत समिति सभापति और कद्दावर आदिवासी नेता संजय कुजूर को मैदान में उतारा गया है।
अलीपुरद्वार जिले में मदारीहाट से जयप्रकाश टोप्पो, कुमारग्राम से राजीव तिर्की और कालचीनी से चाय श्रमिकों के प्रमुख नेता वीरेंद्र बाड़ा को उम्मीदवार बनाया गया है।
दार्जिलिंग जिले की फांसीदेवा सीट से महिला आदिवासी चेहरे के रूप में फांसीदेवा पंचायत समिति सभापति रीना टोप्पो एक्का को टिकट मिला है।
तृणमूल का साफ लक्ष्य है। तराई और डुवार्स के आदिवासी वोट पर पकड़ मजबूत कर जीत हासिल करना। बीते लोकसभा और विधानसभा चुनावों में इन आदिवासी बहुल क्षेत्रों में भाजपा ने अच्छा प्रदर्शन किया था।
अलीपुरद्वार लोकसभा सीट से भाजपा के मनोज तिग्गा सांसद बने थे। विधानसभा में नागराकाटा, कालचीनी, कुमारग्राम, मदारीहाट और फांसीदेवा जैसी सीटों पर भाजपा के विधायक चुने गए थे। केवल माल सीट तृणमूल के पास रही थी।
बाद में मदारीहाट उपचुनाव में तृणमूल ने इस सीट पर कब्जा कर लिया। ऐसे लोकसभा चुनाव में तृणमूल ने तराई-डुवार्स में अपनी स्थिति को कुछ हद तक सुधारा था और वोट प्रतिशत में वृद्धि हुई थी।
आदिवासियों के प्रमुख मुद्दे
क्षेत्र के आदिवासी लंबे समय से जमीन अधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय स्तर पर ही रोजगार की मांग कर रहे हैं। वे अपने विकास के लिए विशेष पैकेज की मांग करते रहे हैं।
डुवार्स इलाके में चाय बागान मजदूरों की दैनिक मजदूरी, वेतन और बोनस भुगतान में देरी, प्राविडेंट फंड, ग्रेच्युटी और अन्य सुविधाओं की समस्या सबसे बड़ी है।
कई बागानों में महीनों का वेतन बकाया रह जाता है
कई बागानों में महीनों का वेतन बकाया रह जाता है। न्यूनतम मजदूरी अभी तक तय नहीं हो पाई है। इसको लेकर यह लोग लगातार आंदोलन भी करते हैं।


