बस्तर का जो क्षेत्र सैकड़ों किलोमीटर तक फैले घने जंगलों, दुर्गम पहाड़ों और उफनते नदियों से भरा हुआ है, कभी माओवादियों का अभेद्य किला रहा है। यहां चार दशकों तक माओवादी सक्रिय थे, जहां न सड़कें थीं, न बिजली, और न ही पुल। ताड़मेटला में 76 जवानों के बलिदान और बुर्कापाल जैसे हमले इस बात के गवाह हैं कि बस्तर में माओवादी गतिविधियों का प्रभाव कितना गहरा था।
वर्ष 2021 में टेकुलगुड़ेम में सुरक्षाबलों पर माओवादियों के हमले ने इस स्थिति में पहली बार निर्णायक बदलाव किया। इस हमले के बाद सुरक्षाबलों ने जंगल में स्थायी उपस्थिति बनाने की रणनीति अपनाई। इसके परिणामस्वरूप पिछले चार वर्षों में 150 नए फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस (एफओबी) स्थापित किए गए। वर्तमान में बस्तर रेंज में 320 सुरक्षा कैंप और एफओबी सक्रिय हैं, जो छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, और अन्य अर्द्धसैनिक बलों द्वारा संचालित हैं।
बीजापुर के पुलिस अधीक्षक जितेंद्र यादव के अनुसार, माओवादी प्रभाव वाले क्षेत्रों में नए एफओबी स्थापित करना युद्ध से कम नहीं है। कैंपों के बीच की दूरी लगभग पांच किलोमीटर रखी जाती है ताकि संकट के समय त्वरित सहायता मिल सके। कई क्षेत्रों में पहाड़ काटकर सड़कें बनाई गई हैं। पिछले दो वर्षों में माओवादियों के 14 अभेद्य गलियारों को भेदा गया है।
अबूझमाड़, जिसे माओवादियों का सुरक्षित ठिकाना माना जाता था, वहां 18 एफओबी स्थापित कर संगठन की रीढ़ तोड़ दी गई है। इससे माओवादियों की गतिविधियों में कमी आई है और उनके सप्लाई सिस्टम को ध्वस्त किया गया है।
माओवाद से लड़ाई
गेम-चेंजर बने एफओबीइस रणनीति का प्रभाव केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं रहा। अब ये कैंप समेकित विकास केंद्र बन गए हैं, जहां सड़क निर्माण, मोबाइल कनेक्टिविटी, बैंकिंग सेवाएं, स्वास्थ्य शिविर और शिक्षा का विस्तार संभव हुआ है। स्थानीय आबादी अब शासन-प्रशासन से सीधे जुड़ रही है, जिससे ग्रामीणों में विश्वास बढ़ा है और उग्रवादी समर्थन तंत्र कमजोर हुआ है।
सुंदररराज पी., पुलिस महानिरीक्षक ने कहा कि सुरक्षा कैंपों की स्थापना ने बस्तर के दुर्गम क्षेत्रों में प्रभावी प्रशासनिक पहुंच सुनिश्चित की है। यह पहल ‘मिशन 2026’ की दिशा में बस्तर को शांति, विकास और स्थायित्व की ओर ले जा रही है।


