सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम, यूपी गैंगस्टर एक्ट की वैधता अब तीन जजों की पीठ के पास; केंद्र को बनाया पक्षकार

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश गैंग्सटर एवं समाज विरोधी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1986 के कुछ प्रविधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली सभी लंबित याचिकाओं को संलग्न करने का आदेश दिया है।

साथ ही कहा कि इन संलग्न याचिकाओं को सुनवाई के लिए तीन जजों की पीठ के समक्ष रखा जाए। यह कानून उत्तर प्रदेश में संगठित अपराध, डकैती, कानून-व्यवस्था व सुरक्षा को खतरे में डालने वाली समाज विरोधी गतिविधियों से लड़ाई के लिए बनाया गया था।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने सभी संबंधित मामलों को संलग्न करने का आदेश देते हुए केंद्र को भी पक्षकार बनाने का आदेश दिया।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता शोएब आलम ने विभिन्न पीठों के समक्ष मामलों की ओवरलैपिंग को लेकर चिंता जताई।

उन्होंने कहा कि जस्टिस जेबी पार्डीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ वर्तमान में संगठित अपराध से जुड़ी भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा-111 पर सुनवाई कर रही है, जबकि वर्तमान याचिका में यूपी गैंग्सटर एक्ट के प्रविधानों को चुनौती दी गई है।

बेंच हंटिंग (पसंद की पीठ के समक्ष याचिका) के सवाल पर आलम ने कहा, ‘हमारी तरफ से बेंच हंटिंग का कोई सवाल नहीं है। अगर कुछ है, तो दूसरी तरफ से यह बताने की जरूरत है कि वर्तमान मामला यहां कैसे सूचीबद्ध किया गया, जबकि इससे जुड़े मामले कहीं और सुने जा रहे हैं।’

उन्होंने यह भी कहा कि जुलाई, 2025 में अधिनियम से जुड़ी एक याचिका को पिछली बार खारिज किया जाना कोई कानूनी मिसाल या मर्जर नहीं था क्योंकि गुण-दोष पर विस्तृत फैसला दिए बिना ही उसे सीधे खारिज कर दिया गया था।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि उत्तर प्रदेश का कानून पूरे भारत में व्यापक विधायी रुझान का हिस्सा है जिनका मकसद संगठित आपराधिक नेटवर्क से निपटना है।

उन्होंने कहा, ‘सभी राज्यों में इसी तरह के कानूनी ढांचे हैं। महाराष्ट्र (मकोका), गुजरात (गुजटाक) और दिल्ली जैसे राज्यों में संगठित अपराध से निपटने के प्रविधान किए गए हैं।’

पीठ ने कहा कि इन कानूनों में संगठित अपराध नेटवर्कों के विरुद्ध जांच और कानून के इस्तेमाल का तंत्र मुहैया कराया गया है। साथ ही इसका उद्देश्य एजेंसियों के बीच समन्वित सहायता के जरिये कानून के क्रियान्वयन को मजबूत करना प्रतीत होता है।

पीठ ने आदेश दिया, ”सभी लंबित याचिकाओं को मौजूदा मामले के साथ संलग्न किया जाए, सिवाय उनके जिन पर आधी सुनवाई हुई है। आधी सुनवाई वाले मामलों को ट्रांसफर नहीं किया जाएगा। सभी टैग किए गए मामलों को तीन जजों की पीठ के सामने सूचीबद्ध करें।”

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