रसोई गैस की कीमतों ने अब शहर के जायके को बिगाड़ना शुरू कर दिया है। जिले में गैस की किल्लत और आसमान छूती कीमतों ने छोटे कारोबारियों की कमर तोड़ दी है। जो खुली गैस (कमर्शियल गैस) कुछ समय पहले तक किफायती थी, उसके दाम अब दोगुने हो चुके हैं। इस डबल मार के कारण ढाबा संचालकों और रेहड़ी-फड़ी वालों के सामने धंधा बचाने का संकट खड़ा हो गया है।
कुछ समय पहले तक जो गैस 120 से 150 रुपये प्रति किलो के आसपास मिल रही थी, उसके दाम अब 250 से 300 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए हैं। गैस की इन बढ़ती कीमतों ने सबसे ज्यादा प्रभावित उन छोटे दुकानदारों को किया है जो बर्गर, चाऊमीन, मोमोज और समोसे जैसे तलने-भूनने वाले व्यंजन बेचते हैं। कीमतों के साथ आपूर्ति का संकट भी गहरा गया है। गैस एजेंसियों पर स्थिति यह है कि बिना एडवांस बुकिंग के सिलिंडर नहीं मिल रहे हैं।
एक गैस सिलिंडर लेने के बाद बुकिंग कराने के लिए 25 दिनों का अंतराल जरूरी हैं। ऐसे में घरेलू सिलिंडर की मांग भी तेजी से बढ़ी हुई है। आपूर्ति में 25 दिन के अंतराल की शर्त के चलते कई दुकानदारों को ब्लैक में महंगी गैस खरीदने पर मजबूर होना पड़ रहा है, जिससे उनकी लागत और अधिक बढ़ गई है। मौजूदा समय में फास्ट फूड के रेट में कोई बढोतरी नहीं हुई है, यदि यही स्थिति रहती है तो रेट भी बढ़ सकते हैं।
ग्राहकों की जेब पर पड़ेगा असर, रेट बढ़ाने के संकेत
फास्ट फूड संचालकों का कहना है कि अब पुराने रेट पर सामान बेचना घाटे का सौदा साबित हो रहा है। सोनीपत के प्रमुख फास्ट फूड केंद्रों पर काम करने वाले संचालकों ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि यदि स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो वे खाने-पीने की चीजों के दाम 10 से 20 प्रतिशत तक बढ़ाने पर मजबूर होंगे। इससे सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ेगा।
ढाबों और रेहड़ी वालों पर सबसे ज्यादा मार
बड़े होटलों के मुकाबले सड़क किनारे रेहड़ी लगाने वाले और छोटे ढाबा संचालकों पर इस संकट का असर सबसे अधिक है। दुकानदारों का कहना है कि एक तरफ कच्चा माल (तेल, मैदा, सब्जियां) महंगा हो रहा है और दूसरी तरफ खुली गैस के दाम दोगुने हो गए हैं। ग्राहकों की संख्या स्थिर है, लेकिन मुनाफ़ा पूरी तरह खत्म हो चुका है।


