देहरादून जल संकट: खतरे में मीठे पानी की पहचान, 30-40% प्राकृतिक जल स्रोत हुए कमजोर

 पहाड़ों की गोद में बसा दून कभी अपने स्वच्छ और मीठे पानी के लिए जाना जाता था। प्राकृतिक स्रोतों से मिलने वाला पानी यहां की पहचान था, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। तेजी से होते शहरीकरण, भूजल के अंधाधुंध दोहन और प्रदूषण ने इस मीठे पानी के शहर के सामने चुनौती खड़ी कर दी है।

पहाड़ों से उतरती स्वच्छ धाराएं सिमट रही हैं, भूजल का स्तर गिर रहा है और नलों तक पहुंचने वाले पानी की गुणवत्ता पर भी सवाल उठने लगे हैं। बढ़ती आबादी और बेतरतीब शहरीकरण के बीच अब हर बूंद की कीमत समझ में आने लगी है।

देहरादून में पानी की गुणवत्ता एक जैसी नहीं है। शहर के अलग-अलग हिस्सों में इसकी स्थिति अलग-अलग नजर आती है। राजपुर रोड, पटेल नगर और प्रेमनगर जैसे शहरी इलाकों में पानी की कठोरता 150 से 300 एमजी प्रति लीटर के बीच पाई जा रही है, जो सामान्य से मध्यम श्रेणी में आती है।

वहीं, आसपास के पर्वतीय और ग्रामीण क्षेत्रों में पानी अपेक्षाकृत कम हार्ड और ज्यादा मीठा है। हालांकि, कुछ बोरवेल वाले इलाकों में यह कठोरता 400 एमजी प्रति लीटर तक पहुंच रही है, जो लंबे समय में स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय बन सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार अधिकतम 200 एमजी प्रति लीटर तक का पानी पीने के लिए अच्छा माना जाता है, जबकि 400 एमजी प्रति लीटर से अधिक कठोरता बेहद नुकसानदेह हो सकती है।

भूजल का स्तर गिरा, गुणवत्ता पर भी सवाल

एक समय था जब देहरादून का भूजल बिना किसी शुद्धिकरण के पीने योग्य माना जाता था, लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। शहर के कई हिस्सों में पानी में नाइट्रेट, फ्लोराइड और बैक्टीरिया की मौजूदगी सामने आ रही है।

सीवेज लीकेज, कचरे का अनुचित निस्तारण और लगातार बढ़ते निर्माण कार्य भूजल को प्रभावित कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अब बोरवेल या हैंडपंप का पानी सीधे पीना सुरक्षित नहीं है। इसे या तो फिल्टर से शुद्ध करना चाहिए या कम से कम उबालकर उपयोग करना चाहिए।

बढ़ती आबादी, घटता जलस्तर

देहरादून की बढ़ती आबादी पानी के संकट को और गहरा रही है। पिछले 15 वर्ष के भीतर दून की आबादी लगभग दोगुना हो चुकी है। जिससे पानी की मांग तेजी से बढ़ रही है। इसका परिणाम यह है कि भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। पारंपरिक जल स्रोत धाराएं और नौले सूखते जा रहे हैं। गर्मियों के मौसम में कई क्षेत्रों में पानी की किल्लत आम समस्या बन जाती है।

प्राकृतिक जल स्रोत की सिमटती विरासत

देहरादून और आसपास के क्षेत्रों में पहले सैकड़ों छोटे-बड़े प्राकृतिक जल स्रोत सक्रिय थे। इनमें धाराएं, नौले, कुएं और झरने प्रमुख रहे शहरी विस्तार और निर्माण कार्यों के कारण कई स्रोत खत्म हो गए। जो बचे हैं, उनमें भी पानी का प्रवाह घटा है। एक अनुमान के अनुसार, दून घाटी में पिछले दो दशकों में 30-40 प्रतिशत प्राकृतिक जल स्रोत या तो सूख चुके हैं या कमजोर हो गए हैं।

मांग के सापेक्ष उपलब्ध नहीं पर्याप्त पानी

देहरादून शहर की बढ़ती आबादी के साथ पानी की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। वर्तमान में अनुमानित मांग करीब 220-250 मिलियन लीटर प्रतिदिन है। जबकि, वास्तविक उपलब्धता लगभग 160-180 एमएलडी है। यानी हर दिन 40-70 एमएलडी पानी की कमी बनी रहती है, जो गर्मियों में और अधिक बढ़ जाती है।

संरक्षण ही एकमात्र रास्ता

विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो दून में जल संकट और गहरा सकता है। वर्षा जल संचयन को अनिवार्य बनाना, पारंपरिक जल स्रोतों का पुनर्जीवन, भूजल रिचार्ज के लिए ठोस नीति, अंधाधुंध बोरवेल पर नियंत्रण, हरियाली और जलागम क्षेत्रों का संरक्षण आदि उपाय ही एकमात्र समाधान हैं।

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