घरेलू हिंसा कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक रोगग्रस्त सामाजिक व्यवस्था का संकेत : सुप्रीम कोर्ट

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 सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि घरेलू हिंसा जैसे चलन अपवाद नहीं, बल्कि ‘रोगग्रस्त सामाजिक व्यवस्था’ का संकेत है और देश में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के अनुभवजन्य आंकड़े एक चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं।

शीर्ष अदालत ने कहा कि देश ने महत्वपूर्ण आर्थिक विकास, साक्षरता में वृद्धि और शिक्षा एवं कार्यबल में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी देखी है, मगर फिर भी ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में पितृसत्तात्मकता रोजमर्रा की जिंदगी का एक अभिन्न अंग बनी हुई है।

संविधान के अधिकारों से वंचित हैं कई लोग

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने ये टिप्पणियां करते हुए अक्टूबर 2012 में आग लगाकर अपनी पत्नी की हत्या करने वाले व्यक्ति को दी गई सजा और आजीवन कारावास को बरकरार रखा।

पीठ ने कहा कि संविधान समानता, लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं करने और जीवन एवं स्वतंत्रता के अधिकार का वादा करता है, लेकिन ऐसे मामले दर्शाते हैं कि इतने वर्षों बाद भी संविधान में निहित अधिकार कई लोगों के लिए अभी भी दूर हैं।

इस मामले में अपनी दोषसिद्धि को चुनौती देने वाले व्यक्ति द्वारा दायर अपील पर सुनवाई करते हुए पीठ ने पाया कि निचली अदालतों ने मृतक के मृत्युपूर्व दिए बयान पर भरोसा किया था।

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