इजरायल और अमेरिका के हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई की मौत हो चुकी है। आगरा में एक ईरानी का मकबरा यमुना किनारा पर बना हुआ है। यह ईरान की काशीकारी कला का अनुपम नमूना है। समय के साथ-साथ स्मारक पर हो रही काशीकारी की कला का अस्तित्व मिटता जा रहा है, जिसे संरक्षित रखने को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा उचित कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।
ईरानी शुक्रुल्ला खां शीराजी ने अपने जीवन काल में कराया था निर्माण
यमुना किनारा पर रामबाग और एत्माद्दौला के मध्य एएसआई द्वारा संरक्षित स्मारक चीनी का रोजा है। यह शाहजहां के वजीर शुक्रुल्लाह शीराजी आफजल खां अल्लामी का मकबरा है। यह एएसआई द्वारा संरक्षित स्मारक है, जिस पर प्रवेश शुल्क लागू नहीं है। इस पर लगे चमकते हुए टाइलों की वजह से इसे चीनी का रोजा के नाम से प्रसिद्धि मिली।
ईरान का काशीन था काशीकारी कला का प्रमुख केंद्र, मिट रही पहचान
लाखौरी ईंटों से बने मकबरे पर चूने का प्लास्टर हो रहा है और बाहरी अलंकरण नीला, पीला, हरा, नारंगी और सफेद रंग के टाइलों का था, जो कि नष्ट हो चुका है और केवल अवशेष बचे हैं। इसमें प्रत्येक फूल व पत्ती के लिए अलग-अलग टाइल लगे हुए हैं। इसे ईरानी काशीकारी कहते हैं। काशीकारी में ईंट की सतह पर दो इंच मोटा प्लास्टर किया जाता था, उसके ऊपर एक इंच मोटी परत चढ़ाई जाती थी। जब वह नम होती थी, तभी उस पर रूपांकन किया जाता था। रूपांकन के अनुसार टाइल लगा दी जाती थी।
इसलिए कहते हैं काशीकारी
इस काशीकारी का घर ईरान का काशीन था। इसलिए इन टाइल को काशी कहा जाने लगा था। वर्तमान पाकिस्तान के सिंध में स्थित हल्ला इसके सामान का केंद्र बन गया था। इस काम काे करने वालों को काशीगर और इस कला को काशीकारी कहते थे। प्लास्टर को खमीर, शीशे को कांच और दोनों के मध्य अस्तर लगाया जाता था।
इसके बनाने की विधि बड़ी जटिल थी। इसमें कई प्रकार के रसायन, बालू, पत्थर और अन्य वस्तुएं प्रयोग में आती थींं। इन्हें विस्तृत पद्धति से विशेष रूप से बनी भट्टी में गरम कर पिघलाया जाता था, जिससे टाइल व उसकी चमक लंबे समय तक बनी रहती थी। जटिलता के चलते यह कला खत्म हो गई।


