सशस्त्र संघर्ष की सनसनीखेज और अति-राष्ट्रवाद पर आधारित खबरें दर्शकों को अवसाद की ओर ले जा रही हैं। इलेक्ट्रानिक चैनलों पर समाचार रिपोर्टों में अक्सर नाटकीय चित्र और भावनात्मक भाषा का प्रयोग किया जाता है।
यह जानकारी पूर्ण विश्लेषण की बजाय दर्शक की मानसिक स्थिति पर प्रभाव डालता है। यह पुष्टि हुई है एम्स गोरखपुर और महात्मा गांधी मेमोरियल मेडिकल कालेज इंदौर मध्य प्रदेश के मानसिक रोग विशेषज्ञों के अध्ययन में। यह अध्ययन फ्यूचर हेल्थ पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।
अध्ययन में नवंबर 2015 में बेरूत और पेरिस में हुए आतंकवादी हमलों का संदर्भ लिया गया है। इसमें एक ट्विटर विश्लेषण से पता चला कि पश्चिमी और अरब मीडिया में सहानुभूति का पूर्वाग्रह था और पीड़ितों को गलत तरीके से पेश किया गया था। इसमें अत्यधिक सहानुभूतिपूर्ण भाषा ने भावनात्मक जुड़ाव को बढ़ा दिया था।
समाचार माध्यमों द्वारा सशस्त्र संघर्षों की कवरेज जनता को सूचित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है लेकिन जब रिपोर्टिंग सनसनीखेज या भावनात्मक रूप से आवेशित हो जाती है तो इसका मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। भारत-पाकिस्तान संघर्ष या इजरायल-गाजा संघर्ष जैसी तनावपूर्ण घटनाओं के दौरान ऐसी रिपोर्टिंग दर्शकों में तनाव, चिंता, अवसाद और अन्य मनोवैज्ञानिक विकारों को बढ़ाने का कारण बनी।
कश्मीर में 26 पर्यटकों की हत्या भी अध्ययन में शामिल
अध्ययन में 22 अप्रैल, 2025 को कश्मीर में आतंकवादी समूहों द्वारा 26 पर्यटकों की हत्या और इसके बाद जवाबी सैन्य कार्रवाई ने भी दर्शकों का तनाव बढ़ाया। नैतिक और जिम्मेदार पत्रकारिता न केवल सटीक रिपोर्टिंग के लिए बल्कि संकट के समय में जनमानस बनाए रखने और सकारात्मक मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए भी आवश्यक है।


