ग्रीनफील्ड हाईवे की पर्यावरणीय स्वीकृति को लेकर बुधवार को तहसील सभागार में लोक सुनवाई की गई। बैठक में अधिकारियों ने उम्मीद जताई कि किसान हाईवे से पर्यावरण को होने वाले नुकसान, शिकायत व सुझावों पर चर्चा करें। लेकिन, किसानों का कहना था कि उनके खेत, खलिहान का अधिग्रहण, मिलने वाला मुआवजा आदि पर चर्चा हो। जब इस संबंध में वे पूरी तरह संतुष्ट हो जाएंगे तभी आगे की चर्चा करने लायक हो सकते हैं।
बैठक में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी अजीत कुमार सुमन, एनएचएआई के परियोजना प्रबंधक पंकज यादव, एडीएम, एसडीएम, तहसीलदार आदि अधिकारी उपस्थित रहे। इसके साथ ही प्रभावित गांवों के किसान भी पहुंचे थे। उन्होंने बताया की क्षेत्र में हाईवे का कुल 49 किलोमीटर का हिस्सा आता है। इस हिस्से में 23 माइनर ब्रिज, पांच मेजर ब्रिज और पानी निकालने के लिए 110 नाले बनने हैं।
हाईवे के निर्माण में करीब 1500 पेड़ों की कटान होगी। प्रदूषण बोर्ड के अधिकारी ने किसानों से पर्यावरण को लेकर आपत्तियां और सुझाव रखने को कहा। लेकिन किसानों ने कहा कि अभी उन्हें अधिग्रहण प्रक्रिया का मुआवजा के संबंध में स्पष्ट जानकारी नहीं है।
टेनापुर गांव निवासी विजय बहादुर सिंह ने पूछा कि किसी को भी हाइवे के अधिकारियों द्वारा अधिकृत नोटिस नहीं दी गई। अधिग्रहण को लेकर तमाम तरह की अफवाहें हैं। इस पर अधिकारियों ने कहा कि अभी अखबार में प्रकाशन कराया गया है। भूमि अधिग्रहण से पहले विधिवत प्रक्रिया के तहत नोटिस भेजा जाएगा।
किसानों ने पूछा कि अगर एक घाटे पर कई खातेदार हैं और और उनका सरकारी बटवारा या अंश निर्धारण नहीं हुआ है तो मुआवजा की क्या प्रक्रिया रहेगी। एडीएम ने बताया कि अभी अधिग्रहण प्रक्रिया में काफी समय है। इससे पहले किसान सरकारी बंटवारा और अंश निर्धारण की प्रक्रिया करा लें अन्यथा जिस गाटा पर जितने भी हिस्सेदार होंगे, सबको बराबर का मुआवजा दिया जाएगा।
हालांकि इस दौरान कुछ सवाल पर्यावरण से संबंधित भी आए। पतरा निवासी अर्पित कुमार ने पूछा की काटे गए पेड़ों की तुलना में कितने और तीस तरह के पेड़ लगाए जाएंगे। अधिकारियों ने बताया कि मियावाकी पद्धति से सिर्फ स्थानीय पेड़ जैसे नेम शीशम पीपल आज ही लगाए जाएंगे उन्होंने बताया कि काटे गए पेड़ों की तुलना में 10 गुना पेड़ लगाने का लक्ष्य है। इस दौरान कैथा निवासी एडवोकेट पंकज सचान ने कहा कि कट ऐसी जगह दिए जाएं जहां प्राकृतिक बहाव हो ताकि भविष्य में बाढ़ का खतरा न पैदा हो सके।


