सोहगीबरवा जंगल में ट्राम-वे रेल के पुन: संचालन पर संकट, ग्रामीणोंं के विरोध के बाद बैरंग वापस लौटी रेलवे की टीम

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 कभी सोहगीबरवा जंगल की शान रही ट्राम- वे रेल परियोजना के पुन: संचालन पर संकट खड़ा हो गया है। 1924 में लक्ष्मीपुर रेलवे स्टेशन के निकट जंगल से लकड़ी ढोने के लिए संचालित ट्राम- वे को 1982 में घाटा दिखा कर बंद कर दिया गया था।

पर्यटन की द़ृष्टि से बीच -बीच में इसे पुन: जंगल में संचालित करने की योजना बनी। बात आगे बढ़ती कि मंगलवार को पूर्वोत्तर रेलवे के अधिकारी एकमा डिपो में मौजूद तीनों इंजनों को ले जाने के लिए आ गए। एक इंजन को शहीद अशफाक उल्लाह खान प्राणी उद्यान व दो इंजनों को लखनऊ के रेल म्यूजियम में रखा जाना था। इस बात की जानकारी जब स्थानीय ग्रामीणों को हुई तो विरोध शुरू हो गया। जिसके बाद बिना इंजन लिए अधिकारियों को वापस लौटना पड़ा।

सोहगीबरवा जंगल की वन संपदा को वन क्षेत्र से मुख्य रेल लाइन तक पहुंचाने के लिए ब्रिटिश शासन काल में ट्राम-वे रेल का संचालन आरंभ किया गया। उस समय इसके निर्माण में
3,51,243 रुपये खर्च हुए थे। लक्ष्मीपुर व उत्तरी चौक रेंज के जंगल में 22.4 किलोमीटर तक रेल लाइन बिछाई गई थी।

इसके निर्माण के समय रास्तेे में पड़ने वाले नदी नालों पर लकड़ी के 17 पुल बनाए गए थे। इसके साथ ही टेढ़ीघाट ,बलुहिया, हथियहवां, गुलरिया को साइडिंग के लिए विकसित किया गया था। वहां से लकड़ियों की लदान होती थी। 1974-1980 के बीच परियोजना 775473 रुपये घाटे में चली गई।

इसके बाद 1982 में इसका संचालन पूरी तरह से बंद कर दिया गया। चार इंजन , 26 बोगियाें, एक सैलून, दो निरीक्षण ट्राली सहित अन्य उपकरणों को एकमा डिपो में सुरक्षित रखा गया था। वर्ष 2009 में एक इंजन, एक सैलून और एक बोगी को लखनऊ चिड़ियाघर भेजा गया ।

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