इस दृष्टि में राज्य नियंत्रक नहीं, बल्कि समाज का सहयोगी और सेवक होता है। यह विचार विकास को मानवीय मूल्यों, सांस्कृतिक परंपराओं और सामाजिक समरसता से जोड़ते हैं, जिससे प्रगति जीवन की गुणवत्ता में वास्तविक सुधार लाया सके।
उच्च शिक्षा संस्थानों की भूमिका इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। विश्वविद्यालय केवल डिग्री प्रदान करने के केंद्र नहीं, बल्कि वैचारिक दिशा देने वाले मंच होते हैं। यदि एकात्म मानववाद को शिक्षा से जोड़ा जाए तो विद्यार्थियों में रोजगारोन्मुख कौशल के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व और नैतिक दृष्टि का विकास संभव है।
ऐसा भारतीय दर्शन, सतत विकास, सामाजिक समरसता और वैकल्पिक अर्थ मॉडल जैसे विषयों पर पाठ्यक्रम शुरू करके किया जा सकता है। शोध के क्षेत्र में भी यह दर्शन नई संभावनाएं खोलता है। ग्राम स्वावलंबन, कुटीर उद्योग, स्थानीय संसाधन आधारित विकास और पर्यावरण संरक्षण पर अनुसंधान कार्यक्रम चलाए जा सकते हैं।
विश्वविद्यालय आसपास के गांवों को ‘लिविंग लैब’ बनाकर शिक्षा और समाज के बीच सेतु स्थापित कर सकते हैं। नैतिक शिक्षा, व्यक्तित्व विकास, स्टार्ट-अप और नवाचार कार्यक्रमों के माध्यम से समाजोपयोगी एवं पर्यावरण-अनुकूल उद्यमों को बढ़ावा दिया जा सकता है।


