हिमालयी राज्य में इस बार मेघों की बेरुखी ने हालात को गंभीर बना दिया है। पर्यावरणीय दृष्टि से सूखे जैसी स्थिति चिंता का विषय बन गई है। सर्दियों में धधक रहे जंगलों ने समस्या को और बढ़ा दिया है।
धुएं के गुबार और धुंध में मौजूद ब्लैक कार्बन व अन्य हानिकारक गैसें पश्चिमी विक्षोभ की ताकत को कमजोर कर रही हैं और वायुमंडलीय नमी को सोख ले रही हैं। नतीजतन, बेहतर बर्फबारी तो दूर, पहाड़ अब सामान्य वर्षा के लिए भी तरस रहा है। प्रदूषण का स्तर इतना बढ़ गया है कि हिमालय की चोटियों का दीदार करना भी कठिन हो गया है।
प्रदूषण का बढ़ता खतरा
- पहाड़ों में ब्लैक कार्बन की मात्रा सामान्य से 8 से 10 गुना अधिक हो गई है।
- वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 100 का आंकड़ा पार कर चुका है, जो चिंताजनक है।
- शरदकाल में हिमदर्शन सैलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र होता था, लेकिन अब धुएं और धुंध में हिमालय की चोटियां ओझल हो रही हैं।
पर्यटन और खेती पर असर
- पर्यटक हिमालय की खूबसूरती न देख पाने से मायूस हैं।
- रबी की लगभग 10 से 15 प्रतिशत खेती सूखे की चपेट में आ चुकी है।
- वनाग्नि से उठते धुएं में मौजूद ब्लैक कार्बन और एरोसोल गैसें (कार्बन डाईऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फेट आदि) ने शरदकालीन वर्षा चक्र को प्रभावित कर दिया है।
निष्कर्ष
वनाग्नि और प्रदूषण ने हिमालयी राज्य की आबोहवा और पारिस्थितिकी तंत्र को गहराई से प्रभावित किया है। नमी की कमी और बर्फबारी का अभाव न केवल पर्यावरणीय संकट को बढ़ा रहा है, बल्कि पर्यटन और कृषि जैसे क्षेत्रों पर भी सीधा असर डाल रहा है।


