35 साल सेवा देने वाले बैंक अधिकारी को हाई कोर्ट से राहत, अत्यधिक दंड को बताया असंगत

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 पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने अनुशासनात्मक मामलों में दंड की अनुपातिकता के सिद्धांत को दोहराते हुए गुरुग्राम निवासी सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी पुरुषोत्तम गोयल को राहत प्रदान की है। अदालत ने सेवानिवृत्ति के बाद लगाए गए अत्यधिक कठोर दंड को अनुचित ठहराते हुए उसमें संशोधन किया और बैंक को पेंशन पुनर्निर्धारण कर बकाया राशि ब्याज सहित जारी करने का निर्देश दिया।

जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने अपने फैसले में कहा कि सेवानिवृत्ति के एक वर्ष बाद वेतनमान में 21 चरणों की कटौती कर 29 हजार 700 रुपये से घटाकर 14 हजार 500 रुपये करना अत्यधिक कठोर और असंगत दंड था। अदालत ने इसे बदलते हुए आदेश दिया कि दो अप्रैल 2014 से प्रभावी पांच वर्ष की अवधि तक पेंशन में प्रति माह पांच प्रतिशत कटौती ही उचित दंड माना जाएगा।

साथ ही बैंक को निर्देश दिया गया कि वह संशोधित पेंशन के अनुसार बकाया राशि छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित अदा करे तथा यदि अधिक वसूली हुई है तो उसे छह सप्ताह के भीतर लौटाए।

अदालत के समक्ष प्रस्तुत तथ्यों के अनुसार, पुरुषोत्तम गोयल ने लगभग 35 वर्ष तक सेवा की और उनके खिलाफ सेवानिवृत्ति से कुछ दिन पहले वर्ष 2011 में पल्ला शाखा में प्रतिनियुक्ति के दौरान 42 ऋणों की अनुशंसा करने को लेकर आरोप लगाए गए थे।

विभागीय जांच में 10 में से चार आरोप सिद्ध माने गए, लेकिन अदालत ने पाया कि बैंक किसी वास्तविक वित्तीय हानि का ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका। कई खाते बाद में नियमित हो गए थे या उनके पास पर्याप्त जमानत भी उपलब्ध थी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संबंधित अधिकारी ने केवल ऋणों की अनुशंसा की थी, उन्हें स्वीकृत करने का अधिकार उनके पास नहीं था, इसलिए परिणामों की पूर्ण जिम्मेदारी उन पर डालना उचित नहीं है।

न्यायालय ने कहा कि न्यायिक हस्तक्षेप सामान्य तौर पर अनुशासनात्मक मामलों में सीमित रहता है, लेकिन जब दंड अत्यधिक या चौंकाने वाली असंगतता वाला हो, तब अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ता है। फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा गया कि दंड हमेशा आरोपित कदाचार की गंभीरता के अनुरूप होना चाहिए।

अत्यधिक कठोर दंड न केवल निष्पक्षता के सिद्धांत को कमजोर करता है बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित समानता के अधिकार का भी उल्लंघन कर सकता है। अदालत ने कहा कि अधिकारी की लंबी बेदाग सेवा और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए दंड को पूरी तरह समाप्त करना उचित नहीं था, लेकिन उसे कम कर संतुलित बनाना न्यायसंगत कदम है।

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