हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ला ने कहा कि हमने दुनिया को दशमलव दिया है। हमारे वेदों में ही सबकुछ है। यह समझाने और समझाने की जरूरत है। मर्यादा, सम्मान हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं, बावजूद इसके युवा पाश्चात्य सभ्यता को अपनाने में दिलचस्पी लेने लगे हैं। ऐसे में वेदों को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए। नई शिक्षा नीति में इसका प्राविधान भी किया गया है।
गुरुवार काे नेशनल पीजी कालेज में ‘भारतीय ज्ञान परंपराएं : ऐतिहासिक आधार और अंतर्विषयक दृष्टिकोण ’ विषयक आयोजित सेमिनार में मुख्य अतिथि शामिल हुए राज्यपाल ने कहा कि ज्ञान परंपराओं ने वैश्विक विज्ञान के विकास में योगदान दिया, जिसे मैक्स मूलर जैसे पश्चिमी विद्वानों ने भी स्वीकार किया। ह्वेनसांग जैसे चीनी यात्रियों ने हमारी संस्कृति को रेखांकित किया है।
देश को केवल सांप-सपेरों की भूमि मानने वाले को आर्यभट्ट, भारद्वाज, चरक, सुश्रुत, आयुर्वेद, शल्य चिकित्सा और कौटिल्य के अर्थशास्त्र को भी पढ़ना चाहिए। केवल आध्यात्मिक चिंतन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बाह्य ज्ञान और अंतरमन ज्ञान का समंवित रूप है, जिसमें चार्वाक दर्शन से लेकर वसुधैव कुटुंबकम जैसी सार्वभौमिक अवधारणाएं सम्मिलित हैं।
हमारे यहां राजा स्वयं भी धर्म और विधि के अधीन होता है,जिससे भारतीय चिंतन में कानून और नैतिकता की सर्वोच्चता सिद्ध होती है। भारतीय ज्ञान परंपरा के पुनर्जीवन से ही हम विश्व गुरु बनेंगे। इससे पहले प्राचार्य प्रो. देवेंद्र सिंह ने अजंता की गुफाओं की अद्भुत शैली पर प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि इस स्थापत्य प्रतिभा ने अमेरिका और आस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों और विद्वानों को भी विस्मित किया है। सेमिनार में पूर्व राज्यसभा सदस्य डा.अशोक वाजपेयी ने भारतीय संस्कृति को विश्व की सबसे श्रेष्ठ और सर्वोत्तम संस्कृति बताया। उन्हाेंने कहा कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा भारतीय ज्ञान प्रणाली को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है जो सराहनीय पहल की।
भारत सेवा संस्थान के राजेश सिंह ने कालेज और हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के बीच शोध, छात्र प्रगति एवं आदान-प्रदान कार्यक्रमों हेतु समझौता ज्ञापन का अनुरोध किया। सेमिनार में उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग उपाध्यक्ष चारू चौधरी, कालेज प्रबंध समिति के सदस्य रणविजय सिंह और सुधीर एस हलवासिया समेत शिक्षक व विद्यार्थी शामिल हुए।


