सनातन धर्म में माता-पिता और पूर्वजों की सेवा केवल उनके जीवित रहने तक सीमित नहीं है। मृत्यु के पश्चात भी श्राद्ध के माध्यम से उनके प्रति आभार व्यक्त किया जाता है। इसी परंपरा में ‘एकोदिष्ट श्राद्ध’ का विशेष महत्व है।
साल 2026 में भिष्म अष्टमी के पावन अवसर पर, जो कि 26 जनवरी को है, इस श्राद्ध का विशेष विधान है। अक्सर लोग पूछते हैं कि यह कठिन दिखने वाला अनुष्ठान कौन कर सकता है और इसे करने का सही समय क्या है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृ ऋण से मुक्ति पाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को यह श्राद्ध करना चाहिए, जिसके परिवार का कोई सदस्य पितृलोक की यात्रा कर चुका हो। इस अनुष्ठान से मृत आत्मा को शांति मिलती है और परिवार के वर्तमान व भविष्य में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
एकोदिष्ट श्राद्ध केवल धार्मिक विधि के अनुसार किए जाने पर ही अपने पूर्ण फल की प्राप्ति देता है। इसलिए पारंपरिक रीति-रिवाज और पुजारी/धार्मिक ग्रंथों के निर्देशों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है।


