दिल्ली हाई कोर्ट ने एक चौंकाने वाले और गंभीर मामले में नाबालिग बेटी से दुष्कर्म करने और उसे गर्भवती करने वाले पिता को उम्रकैद की सजा सुनाने के निर्णय को बरकरार रखा है। न्यायमूर्ति प्रतिबा एम सिंह और न्यायमूर्ति मधु जैन की पीठ ने कहा कि एक पिता का अपने बच्चे की सुरक्षा करना सबसे पहला और महत्वपूर्ण कर्तव्य होता है। ऐसे घिनौने कृत्य के लिए किसी भी प्रकार की रियायत नहीं दी जा सकती।
इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने पहले ही दोषी को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। दोषी व्यक्ति ने इस सजा के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की थी। हालांकि, अदालत ने अपील को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही और न्यायसंगत बताया। अदालत ने स्पष्ट किया कि नाबालिग पीड़िता और उसकी मां के ट्रायल के दौरान अपने बयान बदलने के बावजूद, इस आधार पर दोषी को राहत नहीं दी जा सकती।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि इस प्रकार के अपराध समाज के लिए बेहद खतरनाक हैं और ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई की आवश्यकता होती है। पीठ ने यह भी कहा कि बाल यौन शोषण के मामलों में न केवल कानूनी प्रावधानों का पालन करना जरूरी है, बल्कि ऐसे अपराधियों को कठोर दंड देकर एक संदेश देना भी जरूरी है कि कोई भी अपराधी अपने कर्मों से बच नहीं सकता।
न्यायमूर्ति प्रतिबा एम सिंह और न्यायमूर्ति मधु जैन ने अपने फैसले में यह भी रेखांकित किया कि पिता या माता का कर्तव्य केवल पालन-पोषण या आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं होता। माता-पिता का मूल फर्ज यह होता है कि वे अपने बच्चों को सुरक्षित रखें, उनका मानसिक और शारीरिक विकास सुनिश्चित करें। जब वही माता-पिता अपने बच्चे के साथ शारीरिक और मानसिक अत्याचार करते हैं, तो यह न केवल कानूनी दृष्टि से अपराध है, बल्कि समाजिक और नैतिक दृष्टि से भी अस्वीकार्य है।
हाई कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि ऐसे अपराधों में अपराधी को न केवल उम्रकैद की सजा दी जानी चाहिए, बल्कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि पीड़िता को न्याय मिले और उसका पुनर्वास हो सके। अदालत ने यह भी कहा कि ट्रायल के दौरान किसी भी तरह के बयान बदलने का अपराधी को राहत देने में कोई आधार नहीं बनता। न्यायिक प्रक्रिया में इस प्रकार के आधारों को गंभीरता से नहीं लिया जा सकता क्योंकि इससे न्यायिक फैसलों की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठ सकते हैं।
इस फैसले से यह भी संदेश जाता है कि बाल यौन शोषण और घरेलू हिंसा जैसे अपराधों में दोषियों को कड़ी सजा देने से समाज में सुरक्षा और न्याय का भरोसा बढ़ता है। अदालत ने कहा कि नाबालिग पीड़िताओं के मामले में किसी भी प्रकार की कोताही या उदारता, अपराधियों को बढ़ावा देने के समान हो सकती है।
इस मामले में हाई कोर्ट का निर्णय ट्रायल कोर्ट के फैसले को मजबूत करता है और यह साफ करता है कि नाबालिग बच्चों के साथ यौन शोषण करने वाले किसी भी परिवारिक सदस्य को कानूनी संरक्षण नहीं मिलेगा। अदालत ने इस फैसले के माध्यम से स्पष्ट रूप से यह संदेश दिया कि न्याय प्रणाली हर प्रकार के यौन अपराध के खिलाफ कठोर है, और बच्चों के अधिकारों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है।
न्यायालय ने यह भी कहा कि बच्चों के साथ यौन अपराध न केवल पीड़ित की जिंदगी को प्रभावित करते हैं, बल्कि पूरे समाज में भय और असुरक्षा का माहौल पैदा करते हैं। ऐसे मामलों में दोषियों को सख्त सजा देना और उन्हें समाज से अलग करना आवश्यक है। अदालत ने अपील खारिज करते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट का निर्णय न्याय संगत और उपयुक्त था और इसे किसी भी परिस्थिति में बदला नहीं जा सकता।
इस प्रकार, दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने निर्णय के जरिए स्पष्ट कर दिया है कि बाल यौन शोषण के मामलों में न्यायिक प्रणाली किसी भी प्रकार की उदारता नहीं दिखाएगी और दोषियों को सख्त दंड दिया जाएगा।


