नेताजी सुभाष चंद्र बोस की सनातन आस्था: स्वतंत्रता संग्राम में धर्म, राष्ट्र और आध्यात्मिक चेतना का संगम

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नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारतीय सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं में गहरी आस्था रखने वाले राष्ट्रनायक थे। सनातन हिंदू देवी-देवताओं की उपासना, धार्मिक रीति-रिवाज और आध्यात्मिक चिंतन उनके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा थे। उनके स्वतंत्रता संग्राम और राजनीतिक विचारों में भी भारतीय धार्मिक चेतना का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। हिंदू सनातनी परिवार में जन्म लेने के कारण नेताजी बचपन से ही धार्मिक संस्कारों में रचे-बसे रहे। उनका स्पष्ट मत था कि हिंदुत्व और भारतीयता मूल रूप से एक ही तत्व के दो रूप हैं।

प्रेसिडेंसी कॉलेज में शिक्षा के दौरान नेताजी का संपर्क ऐसे युवाओं से हुआ, जो स्वयं को रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद की परंपरा का वैचारिक उत्तराधिकारी मानते थे। नेताजी ने स्वयं स्वीकार किया है कि कॉलेज के प्रारंभिक दो वर्षों में वे इन साथियों के प्रभाव में आकर बौद्धिक और नैतिक रूप से अधिक प्रखर बने। उनके लिए आध्यात्मिकता केवल उपदेशों तक सीमित नहीं थी, बल्कि सामाजिक सेवा को भी आत्मिक उन्नति का माध्यम माना जाता था। हालांकि नेताजी की दृष्टि में समाज सेवा का अर्थ केवल स्कूल और अस्पताल बनवाना नहीं, बल्कि शिक्षा के माध्यम से राष्ट्रभावना का विकास भी था।

कॉलेज जीवन के दौरान नेताजी सार्वजनिक दुर्गा पूजा आयोजनों में सक्रिय रूप से भाग लेते थे। वर्मा की मांडले जेल से 26 दिसंबर 1925 को अपनी भाभी को लिखे पत्र में उनके धार्मिक और आध्यात्मिक विचारों की गहरी झलक मिलती है। उन्होंने लिखा कि यदि वर्ष में एक बार मां दुर्गा के दर्शन और पूजा का सौभाग्य मिल जाए, तो जेल जीवन भी सहज हो जाता है। नेताजी के अनुसार, दुर्गा माता में उन्हें मां और मातृभूमि—दोनों के दर्शन होते थे।

16 अक्टूबर 1926 को अपने बड़े भाई को लिखे पत्र में नेताजी ने दुर्गा पूजा के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि यह पूजा सात्विक और आध्यात्मिक सौंदर्य, बौद्धिक आनंद और स्थायी धार्मिक शांति प्रदान करती है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि विजयादशमी के दिन बंगाल में लोग मित्रों, संबंधियों और यहां तक कि शत्रुओं को भी प्रेमपूर्वक गले लगाते हैं, जो सामाजिक समरसता का प्रतीक है।

5 मार्च 1933 को अपने मित्र दिलीप कुमार राय को लिखे पत्र में नेताजी ने स्वीकार किया कि वे शिव, काली और कृष्ण भक्ति के द्वंद्व में हैं। उनका विश्वास था कि ईश्वर एक है, लेकिन उसकी उपासना की पद्धतियां और परंपराएं विविध हैं। उन्होंने स्वयं को कभी शैव, कभी शाक्त और कभी वैष्णव विचारधारा के निकट पाया।

नेताजी ने यह भी लिखा कि पिछले कुछ वर्षों से उन्हें मंत्र शक्ति पर गहरा विश्वास होने लगा है। उनके अनुभव में मंत्रोच्चार में विशेष ऊर्जा होती है, जो एकाग्रता बढ़ाने में सहायक होती है। उनका मानना था कि विशिष्ट मंत्रों के निरंतर जाप से मस्तिष्क के कुछ विशेष केंद्र सक्रिय होते हैं। हालांकि, भक्ति मार्ग में उनके बदलते झुकाव के कारण वे मंत्र साधना का पूर्ण लाभ नहीं ले पाए।

अक्टूबर 1925 में मांडले जेल में बंद रहते हुए, जब दुर्गा पूजा का समय आया, तो नेताजी ने जेल अधीक्षक मेजर फिंडले से सनातन विधि से दुर्गा पूजा आयोजित करने की अनुमति मांगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत की जेलों में ईसाई कैदियों को अपने धार्मिक अनुष्ठान करने की अनुमति दी जाती है। बिना सरकारी आदेश की प्रतीक्षा किए जेल अधीक्षक ने नेताजी के इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया, जो उनके धार्मिक अधिकारों की मान्यता का उदाहरण था।

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