बंगाल में राजनीतिक हिंसा के पीड़ित परिवारों को सरकारी नौकरी देगी सरकार, लेकिन दस्तावेज जुटाना होगा बड़ी चुनौती

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 बंगाल की राजनीति में सत्ता बदलती रही, पार्टियों के झंडे और नारे बदलते रहे, लेकिन राजनीतिक हिंसा का सिलसिला थम नहीं सका। कभी माकपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच वर्चस्व की लड़ाई में परिवार उजड़े तो कभी तृणमूल और भाजपा के बीच राजनीतिक संघर्ष में लोगों की जान गई।

इन घटनाओं के पीछे छूट गए परिवारों के लिए जिंदगी का संघर्ष अक्सर अदालतों, पुलिस थानों और आर्थिक तंगी के बीच सिमटकर रह गया। अब मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की सरकार ने पिछले 25 वर्षों में राजनीतिक हिंसा में मारे गए लोगों के परिवारों के एक पात्र आश्रित को सरकारी नौकरी देने की योजना बनाई है।30 अक्टूबर को जारी अधिसूचना के अनुसार, एक जनवरी 2001 या उसके बाद राजनीतिक हिंसा में मारे गए व्यक्ति के परिवार के एक सदस्य को विशेष व्यवस्था के तहत ग्रुप डी पद पर नियुक्ति के लिए विचार किया जाएगा।

सरकार का घोषित उद्देश्य उन परिवारों को आर्थिक सहारा देना है, जिन्होंने हिंसा में अपने कमाने वाले सदस्य को खो दिया। लेकिन 25 साल पुराने मामलों के दस्तावेज, मृतक की राजनीतिक हिंसा में मौत का प्रमाण और परिवार की आर्थिक स्थिति सबसे बड़ी कसौटी होगी।

न्याय की लंबी प्रतीक्षा को फिर सामने लाने का अवसर भी

दूसरी तरफ यह पिछले ढाई दशक के राजनीतिक संघर्ष, हिंसा के शिकार परिवारों की बदहाली और न्याय की लंबी प्रतीक्षा को फिर सामने लाने का अवसर भी है। हालांकि, राजनीतिक हत्या की परिभाषा, घटनाओं का वर्गीकरण और अलग-अलग दलों के दावों के कारण कुल मृतकों की कोई सर्वमान्य संख्या बताना मुश्किल है।

यही वजह है कि 25 साल के दायरे में आने वाले सभी मामलों का एक प्रमाणित और साझा रिकार्ड तैयार करना अपने आप में बड़ी चुनौती होगा। फिर भी माना जाता है कि वाममोर्चा के शासन के अंतिम 10 वर्षों में करीब 500 तथा तृणमूल कांग्रेस के 15 साल के शासनकाल में 300 लोगों की जानें चली गईं।

हालांकि सरकार की ओर से भी पिछले 25 वर्षों में राजनीतिक हिंसा में मारे गए लोगों का कोई आधिकारिक आंकड़ा जारी नहीं किया गया है। इन घटनाओं में अलग-अलग दलों ने एक-दूसरे पर हमले कराने और कार्यकर्ताओं को निशाना बनाने के आरोप लगाए हैं।

नौकरी की पात्रता से बड़ी चुनौती, 25 साल पुराने मामलों का प्रमाण जुटाना

सरकार की इस योजना में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि किसी व्यक्ति की मौत को राजनीतिक हिंसा का परिणाम कैसे प्रमाणित किया जाएगा। अधिसूचना के मुताबिक, मृतक की मौत का राजनीतिक हिंसा से जुड़ा होना जिला स्तरीय स्क्रीनिंग कमेटी प्रमाणित करेगी। इसके लिए प्राथमिकी (एफआईआर), आरोपपत्र और अदालत में आरोप तय किए जाने से संबंधित दस्तावेजों को आधार बनाया जाएगा।

आवेदन मिलने के 90 दिनों के भीतर उसकी जांच पूरी करने का प्रावधान है। लेकिन व्यवहार में यह प्रक्रिया आसान नहीं होगी। 25 साल की हर घटना के दस्तावेज आज भी संबंधित थाने या अदालत में उपलब्ध होंगे, इसकी गारंटी नहीं है।

कई मामलों में जांच पूरी नहीं हुई होगी, कुछ में आरोपपत्र दाखिल नहीं हुआ होगा और कुछ मामलों में मुकदमे वर्षों से लंबित हो सकते हैं। कई परिवारों के पास मृत्यु प्रमाणपत्र तो होगा, लेकिन यह साबित करने के लिए पर्याप्त दस्तावेज नहीं होंगे कि मौत राजनीतिक संघर्ष के दौरान हुई थी। ऐसे परिवारों के लिए सरकारी दफ्तरों और अदालतों के चक्कर लगाना एक नई परेशानी बन सकता है।

नौकरी पाने की उम्र और शैक्षणिक योग्यता की शर्तें बन सकती हैं बाधा

इस योजना का एक मानवीय पक्ष भी है, जिसे प्रशासनिक आंकड़ों में समेटना आसान नहीं होगा। जिन परिवारों ने 15-20 साल पहले अपने कमाने वाले सदस्य को खोया, उनके बच्चे अब बड़े हो चुके होंगे। ऐसे परिवारों में नौकरी पाने की उम्र और शैक्षणिक योग्यता की शर्तें भी कई बार बाधा बन सकती हैं। इसलिए केवल दस्तावेजों की जांच नहीं, बल्कि परिवार की वास्तविक आर्थिक और सामाजिक स्थिति का आकलन भी जरूरी होगा।

राजनीतिक बदले की भावना से ऊपर उठकर योजना को लागू करना सबसे बड़ी कसौटी

शुभेंदु सरकार की इस पहल को राजनीतिक बदले की भावना से ऊपर उठकर लागू करना सबसे बड़ी कसौटी होगी। वाममोर्चा के शासनकाल में मारे गए तृणमूल और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के परिवार हों या ममता बनर्जी के शासनकाल में हिंसा के शिकार हुए माकपा और भाजपा समर्थक, सभी के लिए समान मापदंड अपनाने होंगे। राजनीतिक पहचान के बजाय दस्तावेज, पात्रता और वास्तविक जरूरत को आधार बनाना होगा।

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