धान खेतों में पककर तैयार है, लेकिन तेंदुओं के खौफ के कारण किसानों के कदम खेतों तक जाने से पहले ही ठिठक रहे हैं। गन्ने की ऊंची फसल और झाड़ियों में छिपे तेंदुओं के खौफ ने खेती का तरीका बदल दिया है।
दो दर्जन से अधिक लोगों पर हमला करके घायल होने की घटनाओं ने चिंता बढ़ाई है। गन्ने के खेत और झाड़ियां तेंदुओं के छिपने का ठिकाना बने हुए हैं।
वन विभाग के अभियान के बावजूद ग्रामीणों को खेतों में जाने से पहले आसपास नजर दौड़ानी पड़ रही है। आलमगीरपुर गांव के किसान शीशपाल सिंह, लालापुर पीपलसाना के प्रदीप कुमार और रोहित कुमार का कहना है कि खेत पर जाने से डर लगता है।
तेंदुओं के हमलों ने किसानों को डरा दिया है। महफूज चौधरी का कहना है कि धान की हाथ से कटाई में कई घंटे खेत में बिताने पड़ते हैं। ऊंची फसल और झाड़ियों में छिपे तेंदुए के अचानक सामने आने का डर बना रहता है।
ऐसे में कंबाइन मशीन से कटाई कराकर वे खेत में रुकने का समय कम कर रहे हैं। किसानों का कहना है कि फसल काटने से ज्यादा चिंता अब सुरक्षित घर लौटने की है।
सुरक्षा की कीमत चुका रहे छोटे किसान
कंबाइन मशीन से कटाई कराने पर अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ रहा है। छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह बोझ कम नहीं है, लेकिन जान का खतरा देखते हुए वे मजबूरी में मशीन का सहारा ले रहे हैं।
हाथ से कटाई में मिलने वाली धान की पुआल पशुओं के चारे के काम आती है। कंबाइन से कटाई के बाद पुआल खेत में बिखर जाती है और उसे समेटना कठिन हो सकता है।
ऐसे में कटाई का खर्च बढ़ने के साथ पशुओं के चारे का इंतजाम भी महंगा पड़ेगा। किसान रईस चौधरी ने बताया कि कंबाइन एक एकड़ जमीन का धान काटने के लिए दो हजार रुपये तक लेती है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

