चंडीगढ़ पुलिस में ₹1.10 करोड़ का सैलरी घोटाला:152 जवानों को मिल सकती है राहत, SIT की जांच पूरी; 18 आरोपी गिरफ्तार

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चंडीगढ़ पुलिस के 1.10 करोड़ रुपए के सैलरी घोटाले में फंसे 152 जवानों को राहत मिलने की उम्मीद है। करीब सात साल पुराने इस मामले में गठित स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) जांच पूरी कर चुकी है। अब तक 18 आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है।

एसआईटी चार बार अदालत में चार्जशीट पेश कर चुकी है। घोटाले में करीब 170 जवानों के खिलाफ विभागीय जांच चल रही है। मामले में जवानों की पदोन्नति से लेकर रिटायर हो चुके कर्मचारियों की पेंशन तक अटकी हुई है। घोटाले में कुल 210 जवानों के नाम सामने आए थे, जिनमें से 30 को पहले ही राहत मिल चुकी है।

जांच में पाया गया था कि इन जवानों के खातों में पैसे जमा हुए थे, लेकिन अगले ही दिन वापस चले गए थे। अब जांच पूरी होने के बाद बाकी 152 जवानों को भी राहत मिलने की उम्मीद है।

कैग के ऑडिट में सामने आया घोटाला साल 2020 में एक शिकायत के बाद सैलरी घोटाले का खुलासा हुआ था। पुलिस कर्मचारियों के वेतन की जांच की गई। दिसंबर 2019 के वेतन रिकॉर्ड की जांच में 35 खातों में तय वेतन से ज्यादा पैसे जमा होने का पता चला। पुलिस विभाग के अनुरोध पर कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (कैग) ने वर्ष 2015 से 2020 तक का विशेष ऑडिट किया।

खामियों का फायदा उठाकर वेतन में गड़बड़ी इसमें करीब 1.10 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भुगतान सामने आया। इसके बाद क्राइम ब्रांच में SIT गठित की गई। जांच में पता चला कि पुलिस मुख्यालय में तैनात कुछ जवानों ने ई-सेवार्थ पोर्टल की खामियों का फायदा उठाकर वेतन में गड़बड़ी की थी। वाहन भत्ते, राशन भत्ते और एरियर की फर्जी एंट्री कर खातों में तय रकम से ज्यादा वेतन जमा कराया गया था।

अकाउंट्स ब्रांच में तैनात 2 कर्मचारी गिरफ्तार सेक्टर-3 थाना पुलिस ने 25 फरवरी 2023 को इस मामले में आईपीसी की धारा 201, 409, 420, 467, 468, 471, 477ए और 120बी के अलावा भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत केस दर्ज किया था। जांच के दौरान एएसआई विनोद कुमार और कांस्टेबल राजबीर सिंह को गिरफ्तार किया गया। घोटाले की अवधि के दौरान दोनों अकाउंट्स ब्रांच में तैनात थे। विनोद कुमार ट्रेजरी ड्यूटी संभालता था, जबकि राजबीर सिंह वेतन बिल, बकाया वेतन और एलटीसी लीव इनकैशमेंट का काम देखता था।

खाताधारकों को पैसे का हिस्सा देने का लालच जांच में सामने आया कि अतिरिक्त वेतन की रकम अलग-अलग जवानों के खातों में जमा कराई जाती थी। आरोपियों को उम्मीद थी कि खाताधारक रकम का कुछ हिस्सा अपने पास रखेंगे और बाकी पैसा संबंधित आरोपियों में बांट दिया जाएगा। इस तरह वेतन के रिकॉर्ड में गड़बड़ी कर सरकारी रकम का गलत तरीके से भुगतान किया गया।

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