पंजाब की एक बहुत ही मशहूर गायन शैली है टप्पा, इसमें बने लोकगीत दशकों से हम सभी का मोनरंजन कर रहे हैं। हम इन गीतों पर गौर करें तो छोटी-छोटी तुकबंदी वाली पंक्तियां और तेज गति इसे पंजाबी जश्नों की शान बनाती हैं। आज हम एक ऐसे ही पंजाबी लोकगीत की बात करने वाले हैं, जिसका नाम है ‘बल्ले-बल्ले नी टौर पंजाबन दी’, इस गाने को सुनकर कोई भी थिरकने को मजबूर हो जाएगा।
अक्सर जब भी कोई पंजाबी ‘बल्ले-बल्ले’ कहना शुरू करता है, तो महफिल में बैठे सभी लोग अपने आप ही जोश से भर जाते हैं। ऐसा लगता है कि हर पंजाबी का ‘बल्ले-बल्ले’ कहना तकियाकलाम है, पर बात सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। पंजाब में एक बड़ा ही फेमस लोकगीत इस शब्द से शुरू होता है, हम बात कर रहे हैं अक्सर ही पंजाब में शादियों के मौके पर गाए जाने वाले ‘बल्ले-बल्ले नी टौर पंजाबी दी’ गीत की। जिसके बोल कुछ इस तरह हैं:
महिला की ठसक और अदाओं की तारीफ करते हैं बोल
इस गीत को ध्यान से सुनें तो हम पाते हैं कि इसके बोल पंजाबी महिला की खूबसूरती, उसकी चाल-ढाल, ठसक और अदाओं की तारीफों के पुल बांधते हैं। जब कहा जाता है कि ‘जुत्ती खल दी मरोड़ा न यू चल दी टोर पंजाबन दी..’ तो यहां महिला की चमड़े की जूती की तारीफ हो रही होती है। वह जब मरोड़े खाती है, तब महिला की चाल बेहद आकर्षक लगती है।
वहीं, इस गीत के बोल ‘काली कघरी लावा दे गोटा जे तू मेरी टोर वेखणी….’ में नायिका नायक से बड़े ही प्यार भरे अंदाज में फरमाइश कर डालती है कि अगर मेरी सुंदर चाल देखनी है, तो मेरे काले लहंगे पर गोटा-पट्टी का काम करवा दो।
टप्पा शैली से है इस लोकगीत का खास नाता
यह गीत गाते हुए जिस तरह से तेज गति से तान-मुरकियों का उपयोग होता है, वह पंजाब की एक मशहूर गायकी टप्पा शैली पर आधारित है। सबसे खास बात कि इस लोकगीत पर भांगड़ा और गिद्धा दोनों ही किया जाता है। बता दें कि टप्पा हिन्दुस्तानी सेमी-क्लासिकल गायकी शैली है, जिसकी जड़ें पंजाब और सिंध प्रांत के ऊंट चालकों से जुड़ी हुई हैं

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

