पितृ पक्ष को हिंदू धर्म में पितरों को समर्पित समय माना जाता है। इस दौरान तर्पण और श्राद्ध करके पूर्वजों को प्रसन्न किया जाता है। इस पूरी अवधि में लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए विधि-विधान से श्राद्ध और पिंडदान करते हैं।
क्या पितृ पक्ष में मृत्यु से खुलते हैं मोक्ष के द्वार?
गरुड़ पुराण में मोक्ष पाने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी अच्छे कर्मों को बताया गया है। केवल किसी विशेष तिथि या पक्ष में मृत्यु होने से मोक्ष नहीं मिलता है।
मोक्ष पाने के लिए कर्म, जीवन में किए गए धार्मिक कार्य और भक्ति भी जरूरी होती है। पितृ पक्ष का समय विशेष रूप से पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का होता है और उनके निमित्त कर्म करने का अवसर माना जाता है। ऐसा कहना पूरी तरह से सही नहीं कि इस अवधि में मृत्यु होने से ही मोक्ष मिलता है।
पितृ पक्ष में मृत्यु होने पर श्राद्ध के नियम
- यदि किसी व्यक्ति को मृत्यु पितृ पक्ष के दौरान होती है, तो उसके अंतिम संस्कार के वही नियम लागू होते हैं, जो अन्य समय में होते हैं।
- इस दौरान अन्य पूर्वजों के श्राद्ध की मनाही होती है और तीन साल तक घर में कोई भी श्राद्ध कर्म नहीं होते हैं।
- मृत्यु के बाद मृतक के लिए सभी संस्कार किए जाते हैं जिसमें तेरहवीं संस्कार को प्रमुख माना जाता है।
- यदि मृत्यु पितृ पक्ष के दौरान हुई है, तो उस व्यक्ति का श्राद्ध सामान्यतः उसकी मृत्यु की तिथि के अनुसार ही तीन साल बाद अन्य पूर्वजों के साथ मिलान के बाद किया जाता है।
- श्राद्ध में तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोज जैसे कर्म किए जाते हैं और अन्य नियमों का पालन भी श्रद्धा से किया जाता है।
- पितृ पक्ष में मृत्यु होने का मतलब यह नहीं है कि मृत व्यक्ति का श्राद्ध नहीं किया जाएगा, लेकिन मृतक का श्राद्ध उस समय से आरंभ होता है जब उनका अन्य पूर्वजों के साथ मेल हो जाता है।
धार्मिक परंपरा में गरुड़ पुराण को मृत्यु और उसके बाद की अवस्था को समझने वाला महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। उसमें बताया गया है कि पितृ पक्ष में किसी व्यक्ति की मृत्यु से मोक्ष का कोई संबंध नहीं है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

