बिहार की शादियों में गाली गीत की परंपरा, दूल्हे को सुनाए जाते हैं खास गीत

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बिहार की शादियों में गाली गीत की अनोखी परंपरा, सदियों से चली आ रही रस्म; दूल्हे को सुनाए जाते हैं खास गीत

बिहार की शादियों में कई ऐसी लोक परंपराएं हैं, जो आज भी अलग-अलग इलाकों में निभाई जाती हैं। इन्हीं में एक है ‘गाली गीत’ की परंपरा। शादी के मौके पर दूल्हे और उसके परिवार के सदस्यों को संबोधित करते हुए महिलाएं पारंपरिक गीत गाती हैं। नाम भले ही ‘गाली गीत’ हो, लेकिन लोक परंपरा में इसे मनोरंजन और हंसी-मजाक से जुड़ी रस्म के तौर पर देखा जाता है।

बताया जाता है कि यह परंपरा लंबे समय से बिहार के कई हिस्सों में चली आ रही है। विवाह समारोह के दौरान महिलाएं समूह में बैठकर दूल्हे पक्ष को लेकर ऐसे पारंपरिक गीत गाती हैं, जिनमें हास्य और व्यंग्य का पुट होता है।

गाली गीतों में होता है हास्य और ठिठोली

इन लोकगीतों का उद्देश्य आम तौर पर माहौल को खुशनुमा बनाना और शादी समारोह में दोनों पक्षों के बीच अपनापन बढ़ाना माना जाता है। गीतों में दूल्हे, उसके रिश्तेदारों और विवाह से जुड़े प्रसंगों का मजाकिया अंदाज में जिक्र किया जाता है।

इन गीतों की खासियत यह है कि इन्हें लिखित रूप में पढ़ने के बजाय मौके के अनुसार गाया और बदला भी जाता रहा है। अलग-अलग क्षेत्रों में इनकी भाषा, धुन और बोल में अंतर देखने को मिलता है।

पीढ़ियों से आगे बढ़ रही लोक परंपरा

बिहार की लोक संस्कृति में विवाह गीतों का खास स्थान है। सोहर, विदाई और अन्य मांगलिक गीतों की तरह गाली गीत भी कई परिवारों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ते रहे हैं। बुजुर्ग महिलाएं नई पीढ़ी को इन गीतों की धुन और परंपरा सिखाती रही हैं।

समय के साथ शादी समारोहों का स्वरूप बदल रहा है और डीजे व आधुनिक संगीत का चलन बढ़ा है। इसके बावजूद कई जगहों पर पारंपरिक गाली गीत आज भी विवाह समारोह का हिस्सा बने हुए हैं।

इस तरह बिहार की शादियों में गाली गीत केवल मजाक या गाली देने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कई क्षेत्रों में ये विवाह से जुड़ी लोक-सांस्कृतिक परंपरा के रूप में देखे जाते हैं।

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