बिहार से बंगाल तक बनेगा 719 KM लंबा एक्सप्रेसवे, ₹60 हजार करोड़ की परियोजना से बदलेगी कनेक्टिविटी
पटना। बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल को जोड़ने वाली रक्सौल-हल्दिया ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे परियोजना पूर्वी भारत की बड़ी सड़क परियोजनाओं में शामिल है। करीब 719 किलोमीटर लंबे इस प्रस्तावित कॉरिडोर की अनुमानित लागत लगभग 60 हजार करोड़ रुपये बताई जा रही है। इसका उद्देश्य भारत-नेपाल सीमा के प्रमुख व्यापारिक केंद्र रक्सौल को पश्चिम बंगाल के हल्दिया बंदरगाह से बेहतर सड़क संपर्क देना है।
नेपाल सीमा से हल्दिया पोर्ट तक सीधी कनेक्टिविटी
रक्सौल-हल्दिया एक्सप्रेसवे का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसकी कनेक्टिविटी है। रक्सौल भारत-नेपाल व्यापार के लिहाज से महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जबकि हल्दिया पूर्वी भारत का प्रमुख बंदरगाह है। ऐसे में दोनों के बीच हाई-स्पीड सड़क संपर्क बनने से माल ढुलाई और लॉजिस्टिक्स को फायदा मिलने की उम्मीद है।
प्रस्तावित एक्सप्रेसवे करीब छह लेन का एक्सेस-कंट्रोल कॉरिडोर होगा। उपलब्ध परियोजना विवरणों के अनुसार, इससे रक्सौल से हल्दिया के बीच यात्रा और माल परिवहन के समय में कमी आने की संभावना है।
बिहार के कई जिलों से होकर गुजरेगा कॉरिडोर
बिहार में प्रस्तावित रूट पूर्वी चंपारण, शिवहर, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, समस्तीपुर, बेगूसराय, खगड़िया, लखीसराय, मुंगेर, जमुई और बांका जैसे जिलों को जोड़ने की योजना से जुड़ा है। इससे उत्तर बिहार और दक्षिण-पूर्वी बिहार के बीच सड़क संपर्क मजबूत हो सकता है।
परियोजना में गंगा नदी पर प्रस्तावित पुल भी अहम कड़ी है। बेगूसराय और शाम्हो क्षेत्र को बेहतर संपर्क देने के लिए पुल के साथ एप्रोच रोड की योजना पर भी प्रशासनिक स्तर पर काम आगे बढ़ने की जानकारी सामने आई है।
झारखंड होते हुए पश्चिम बंगाल पहुंचेगा एक्सप्रेसवे
बिहार के बाद प्रस्तावित कॉरिडोर झारखंड के देवघर, दुमका और जामताड़ा क्षेत्र से होते हुए पश्चिम बंगाल की ओर बढ़ेगा। इसके बाद पश्चिम बंगाल के विभिन्न हिस्सों से गुजरते हुए यह हल्दिया पोर्ट तक पहुंचने की योजना है।
इससे बिहार और झारखंड के कई इलाकों को समुद्री बंदरगाह से सीधा सड़क संपर्क मिल सकता है। बेहतर कनेक्टिविटी का असर माल परिवहन के साथ-साथ स्थानीय व्यापार, वेयरहाउसिंग और लॉजिस्टिक्स गतिविधियों पर भी पड़ने की संभावना है।
उद्योग और रोजगार को मिल सकता है फायदा
इतने बड़े कॉरिडोर के विकसित होने से इसके आसपास औद्योगिक और व्यावसायिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। कृषि उत्पादों को बड़े बाजारों तक पहुंचाने, कच्चे माल की आवाजाही और तैयार उत्पादों की ढुलाई में भी सुविधा हो सकती है।
इसके अलावा एक्सप्रेसवे के आसपास ट्रांसपोर्ट, वेयरहाउस, लॉजिस्टिक्स और अन्य सहायक कारोबार विकसित हो सकते हैं। हालांकि, इन संभावित आर्थिक प्रभावों का वास्तविक स्तर परियोजना के निर्माण और संचालन के बाद ही स्पष्ट होगा।
डीपीआर और भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया महत्वपूर्ण
परियोजना को जमीन पर उतारने के लिए डीपीआर, अंतिम एलाइनमेंट और भूमि अधिग्रहण जैसी प्रक्रियाएं महत्वपूर्ण हैं। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय हाई-स्पीड कॉरिडोर और ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे परियोजनाओं में भूमि अधिग्रहण को तेज करने के लिए भूमि राशि पोर्टल और जीआईएस आधारित योजनाओं जैसे उपायों का इस्तेमाल किया है।
रक्सौल-हल्दिया परियोजना के अलग-अलग हिस्सों और पैकेजों से संबंधित डीपीआर प्रक्रिया का भी उल्लेख उपलब्ध दस्तावेजों में मिलता है। इसलिए परियोजना की समयसीमा और अंतिम रूट को लेकर आगे की प्रशासनिक एवं तकनीकी प्रक्रिया महत्वपूर्ण रहेगी।
कुल मिलाकर, रक्सौल-हल्दिया एक्सप्रेसवे का प्रस्तावित कॉरिडोर भारत-नेपाल सीमा को पूर्वी भारत के समुद्री व्यापार नेटवर्क से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण सड़क परियोजना हो सकता है। करीब 719 किलोमीटर लंबा और लगभग 60 हजार करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाला यह प्रोजेक्ट बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में कनेक्टिविटी के साथ व्यापार और लॉजिस्टिक्स को प्रभावित कर सकता है। हालांकि इसके अंतिम प्रभाव परियोजना के निर्माण, एलाइनमेंट और संचालन के बाद ही स्पष्ट होंगे।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

