गुरुग्राम में अब नहीं भरेगा पानी! IIT का एक्वीफर रीचार्ज मॉडल ग्राउंडवॉटर को भी कर देगा रिचार्ज
आईआईटी गांधीनगर के एक्वीफर रीचार्ज माडल पर अगर काम किया गया तो अगले मानसून में गुरुग्राम को बाढ़ जैसी स्थिति से बचाया जा सकता है।
गांधीनगर के एक्सपर्ट की रिपोर्ट के मुताबिक डिटेंशन, ट्रीटमेंट और कंट्रोल्ड इंजेक्शन पर आधारित एक्वीफर (जलभृत) रीचार्ज माडल तैयार किया गया है।
इसके तहत वर्षा जल को पहले एकत्र कर वैज्ञानिक तरीके से उपचारित किया जाएगा और फिर गहरे एक्वीफर तक पहुंचाया जाएगा।
डिटेंशन टैंक में कैसे इकट्ठा होगा पानी
वर्षा के दौरान सड़कों से तेजी से बहने वाले पानी को पार्कों और पार्किंग क्षेत्रों के नीचे बनाए जाने वाले भूमिगत डिटेंशन टैंक में एकत्र करने का प्रस्ताव है। इसका उद्देश्य वर्षा के पीक समय में नालों और ड्रेनेज सिस्टम पर पड़ने वाले दबाव को कम करना है।
इसके बाद एक रिपोर्ट तैयार की गई है, जिसमें जलभराव वाले स्थानों पर तेजी से जलनिकासी के उपाय बताए गए हैं। नगर निगम के चीफ इंजीनियर विजय ढाका ने बताया कि आईआईटी की ओर से मिले सुझावों पर नगर निगम ने काम शुरू कर दिया है। अगले मानसून में जलभराव वाले स्थानों की संख्या घटाने की तैयारी है।
चार चरणों में होगा पानी का उपचार
रीचार्ज से पहले पानी को चार चरणों से गुजारने की योजना है। स्क्रीनिंग के माध्यम से पत्तियां और ठोस कचरा अलग किया जाएगा। इसके बाद ग्रीट चैंबर में रेत और मिट्टी को हटाया जाएगा।
ऑयल सेपरेशन यूनिट से तेल और ग्रीस अलग होंगे, जबकि अंतिम चरण में फाइन मीडिया फिल्ट्रेशन से पानी को साफ किया जाएगा। इसके बाद ही उपचारित पानी को रीचार्ज के लिए भेजा जाएगा।
एक्वीफर तक इस तरह पहुंचेगा पानी
साफ किए गए पानी को विशेष इंजेक्शन वेल के माध्यम से गहरे एक्वीफर तक पहुंचाने का प्रस्ताव है। रिपोर्ट में उथले एक्वीफर में पानी पहुंचाने से बचने पर विशेष जोर दिया गया है, ताकि आसपास की मिट्टी, भूजल स्तर और भवनों की नींव पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। पानी की गुणवत्ता या दबाव निर्धारित सीमा से बाहर जाने पर आटोमैटिक आइसोलेशन वाल्व सिस्टम को तत्काल बंद कर देगा।
क्या होता है एक्वीफर, कितनी गहराई में होता है
एक्वीफर जमीन के नीचे चट्टानों, रेत, बजरी या अन्य परतों में मौजूद वह भूगर्भीय क्षेत्र है, जिसमें पानी जमा रहता है और प्रवाहित भी हो सकता है। बोरवेल भी इन्हीं एक्वीफर के नीचे किया जाता है।
इसकी गहराई पूरे शहर में एक जैसी नहीं होती। अलग-अलग स्थानों पर भूगर्भीय संरचना के अनुसार उथले और गहरे एक्वीफर अलग-अलग गहराई पर मिल सकते हैं।
पालम विहार का पायलट प्रोजेक्ट हुआ सफल
रिपोर्ट में पालम विहार के दो पार्कों में किए गए पायलट परीक्षण के परिणाम भी शामिल हैं। यहां 14,000 घन मीटर क्षमता वाले डिटेंशन सिस्टम और रीचार्ज वेल के परीक्षण में सड़क पर जलभराव की गहराई में 11.8 प्रतिशत और कुल जलभराव वाल्यूम में 26.2 प्रतिशत कमी दर्ज की गई। पायलट के परिणामों से शहर में बड़े स्तर पर इस तकनीक को लागू करने की संभावना मजबूत हुई है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

